मंदिर की परिकल्पना ऐसे स्थल के रूप में सर्वविदित है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति,जो उस पद्धति पर विश्वास रखता है, निर्बाध रूप से अपनी उपासना कर सके। मंदिर प्रायः सार्वजनिक स्थल ही होते है। मंदिर परिसर आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने तथा धार्मिक आचरण को निर्वहन करने का केंद्र है। मंदिर परिसर में भगवान के समक्ष सभी समान है। संवैधानिक रूप से भी हम समान है।
उपर्युक्त छायाचित्र, एक महिला के द्वारा मंदिर परिसर में तथाकथित भेदभाव(दर्शन संबंधी) का विरोध करते हुए गर्भगृह में जाकर शिव जी पर जल चढ़ाने,उनकी पूजा-अर्चना का है। सामान्य दृष्टि से उन्होंने स्थापित व्यवस्था का विरोध किया और जबरिया पूजा-अर्चना किया लेकिन उन्होंने इस मध्यम से जिस विषय पर लोगो का ध्यान आकृष्ट किया वह अत्यंत महत्वपूर्ण है, कि
"क्या मंदिर जैसे धार्मिक स्थल पर आर्थिक आधार(VIP व्यवस्था) पर भेदभाव जायज है...?"
जो सर्वथा अनुचित है।
प्रथमतः, तो ये आर्थिक सक्षमता के आधार पर विभेदीकरण की बात हुई।
द्वितीय, आर्थिकता इतनी महत्वपूर्ण है, कि किसी को उनके आराध्य के पूजन से वंचित किया जा सकता है?
तृतीय और सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात, कि मंदिर परिसर कोई व्यवसायिक संस्थान नही है। लोगो की आस्था का केंद्रबिंदु है।
निश्चित ही किसी बड़े धार्मिक केंद्रों,मंदिर परिसरों में ट्रस्ट का कार्य व्यवस्था निर्धारण तथा समुचित प्रबंधन का होता है लेकिन ऐसी विभेदकारी नीति का निर्धारण न्यायसम्मत तथा व्यवहारसम्मत नही है।
मेरे अपने विचार इस VIP व्यवस्था के विरुद्ध है..........आपके विचारो की अपेक्षा में.
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