लगभग दो वर्ष के कोरोना महामारी के दौर में सरकारी नियोजन(नौकरी) में हुए स्थगन के पश्चात "भर्ती प्रक्रिया" ने दम भरना प्रारम्भ ही किया था,गति का अनुभव कुछ मात्रा में छात्रों ने लिया ही था,कुछ एक भर्ती लाखो छात्रों के मन मे यह उम्मीद तो जगा रखा था,कि आने वाले सत्र हम अपना झंडा अवश्य ही परचम कर सकेंगे,अब रुकेंगे नही,थकेंगे नही,ले के रहेंगे आजादी जैसे नारो में आजादी को नौकरी से प्रतिस्थापित कर मन मे दृढ़ संकल्पित भाव से तैयारी कर रहे थे/है .........लेकिन इसी मध्य 2012 में लिए गए तत्कालीन सरकार का निर्णय,जिसमे छत्तीसगढ़ में आरक्षण की सीमा को 50% से उल्लंघित करते हुए....58% कर दिया था........जो मामला किसी याचिकाकर्ता के माध्यम से संवैधानिकता के आधार तले उच्च न्यायालय में दाखिल हुआ........
यहाँ से आरक्षण जैसे मुद्दों पर राजनीतिक बिसात की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है,यह छात्रों(राज्य प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहे माहौल में कहा जाए तो "एस्पिरेन्ट") के मध्य चर्चा का विषय बनाता है.......और कुछ समय मामला न्यायालयीन प्रक्रिया में ओझल होता है.....राजनीतिक चाल सिद्ध होता है मामला धर में लटका रहता है......
धीरे से राज्य के तैयारी कर रहे छात्र और सारे प्रशासनिक महकमा इस पद्धति को आत्मसात कर सहज हो गए थे......इस अनुरूप ही अपने को चयनित करने की स्ट्रैटेजी(रणनीति) में तैयारी करने प्रारम्भ किये और चयनित भी होते गए.......
वह प्रक्रिया जिसके तहत हमने भी तैयारी की है,उसके अनुरूप ही भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए.......इसी दरमियान Cgpsc21 के साक्षात्कार (iterview) के एक दिवस पूर्व ही(अब इसे संयोग कहे या.....) 2012 आरक्षण संशोधन संबंधी मामला का निर्णय आता है,जो चलते आ रही 58% आरक्षण रोस्टर को असंवैधानिक घोषित करती है..........
जिसके पश्चात भी साक्षात्कार लिया गया......इस निर्णय संबंधी मामले की गंभीरता को ऐस्पिरेन्ट(छात्रों) के द्वारा तब तक नही समझा गया था,जब तक छात्र परिणाम का इंतजार कर-कर के तंग हो गए और अन्ततः यह ज्ञात होने तक,कि इस विलंब कारण तो 19 सितम्बर को माननीय उच्च न्यायालय के द्वरा दिया गया निर्णय था.......
यह तो राज्य प्रशासनिक सेवा के संदर्भ में था........कुछ इसी प्रकार अन्य भर्तियां(जिनका दस्तावेज सत्यापन तक हो चक है,जिनकी केवल नियुक्ति आदेश का इंतजार था,ऐसे परीक्षा) जैसे खाद्य निरीक्षक आदि जैसे मामले ठंडे बस्ते में चली गई है........
इसी तारतम्य में लंबे वर्षो से अधर पर लटका हुआ "उप निरीक्षक" की परीक्षा,जो जैसे तैसे लिया जा रहा था,वह भी स्थगित किया गया.......जो भविष्य के अंधकार में छात्रों की भावनाओ,संवेदनाओ और धैर्य को समेटे हुए कही लुप्त सा प्रतीत होता है.......आगे क्रम में अनेक प्रक्रिया.....ACF साक्षात्कार,महाविद्यालयिन भर्तियाँ..... आदि है.....
इस प्रकार छात्रों के समक्ष अब प्रश्नचिह्न खड़ा होता है,कि
1) उनके धैर्य की परीक्षा कब तक होगी......??.....(इसमें अब छात्रों के लिए चयन हेतु मुख्यतः दो परीक्षा पास करना अनिवार्य हो गया है,एक मुख्य परीक्षा और दूसरा धैर्य की परीक्षा)
2)इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन...??......(राजनीतिक स्वार्थगत प्रेरित सरकार या न्यायालयीन विलंबता........लेकिन यह न्यायालयीन मामला बना ही क्यो.....?)
3)आगे समाधान का राह भी क्या निष्पक्ष होगा,कि वह भी राजनीति से प्रेरित......??
कुल मिलाकर छात्रों के हितों को गर्त की ओर उन्नयित(धकेला) किया जा रहा है......सत्ता अपना स्वार्थ साधती रही है/साधती रहेगी.......और हम ठहरे कोल्हू के बैल जो घिसे चले जा रहे है.........
ठीक है सबके लिए तो सरकारी नियोजन उपलब्ध न हो लेकिन जो है उसकी प्रक्रिया को तो निर्विवाद रहने दो........अब इसे अनुनय-विनय समझे या विरोध,ये समझने वाले के ऊपर है........
इन्ही विचारो के साथ आपके विचारों की अपेक्षा में आपका........😊 है.........