Thursday, December 31, 2020

नववर्ष,2021 पर विचार

मंदिर में दूध चढ़ाए तो,दीनन की चिंता सताने लगी
मंदिर में पैसे चढ़ाए तो,अस्पताल की यादें आने लगी।

लेकिन नववर्ष की बेला में,गहमागहमी की ये रेला में
क्या किसी ने ऐसा सोचा कि,दे कंबल उन गलियारों में।

उन राहो में न चमकचांद,बस बिखरी है दीनता की आंध
राहो में नववर्ष मनाओ तुम,जिससे मीले असीमित सुकून
जो केक काटते राहो में,रंगरलियां हो चौक-बाजारों में
इन पैसों का संयोग करो,दिनन के सुख में उपयोग करो।।

तो सोचु क्यो मैं दूध चढ़ाऊँ,क्यो न उसे मैं बांट आउ
नर में श्रीहरि नारायण देख,इन भावो को मैं बिखराउ।
पहले तो ज्ञानवानियो खुद,ऐसे गुणो को जगाना तुम
तत्पश्चात सनातनियो को,सार्थक पाठ पढ़ाना तुम ।।

:-कृपेन्द्र तिवारी........✒️✒️✒️

Saturday, December 19, 2020

संगठित होना है जरूरी.....

संगठित_होना_है_जरूरी

भारतीय इतिहास संघर्षो का इतिहास है।इसमे अनेक आक्रमणकारी प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक आये,उनके द्वारा स्थानीय शासन से परस्पर विस्तारवादी नीतिओ को लेकर संघर्ष होते रहे.......लेकिन इतिहास के अध्ययन का उद्देश्य ही होता है,कि पूर्व में दोहराई गई गलतियो का पुनःआचरण न हो....

भारतीय इतिहास में इस संघर्ष और गुलामी के पीछे के कारण को हम तर्कसंगत दृष्टिकोण से देखे तो स्पष्टीकृत होता है,कि हममे चिरकाल से लेकर अधुनातन काल तक संगठन,परस्पर सहयोग और समन्वय की भावना का अभाव रहा है। यही कारण रहा कि हमारा भारत देश एक केंद्रीकृत राष्ट्र के रूप में पूर्व से छवि बनाने में असफल रहा है....केवल अपवाद जैसे चंद्रगुप्त मौर्य जैसे शासको के शासनकाल को छोड़कर......

महत्वपूर्ण कारणों का अध्ययन करे तो दृष्टिगत होता है,कि हमारी स्वार्थिक भावना तथा साम्राज्यवादी नीतियां ऐसी रही है,कि जो हमारे लिए ही घातक सिद्ध होती रही.....ऐसी विचारधारा कि "आक्रमणकारी शत्रु राज्य पर आक्रमण कर रहा है तो मुझे क्या मतलब" ऐसे भाव ही हमारे गुलाम होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण है.......जो हमारे पूर्वजो के संकीर्ण मानसिकता का उपज है..........

हमे "unity is strength" अर्थात एकता में ही शक्ति है के मूलभूत भाव को आत्मसात करना चाहिए.....और आज के परिदृश्य में यही हमारी एकता का भाव,आक्रमणकारी बाबर के सेनापति "मीर बाकी" के द्वारा 1528 में तोड़े गए मंदिर के पश्चात किये गए मस्जिद निर्माण के क्रूरतम कदम का निवारण आज कर रही है......इसका मुख्य कारण है हिन्दू पक्ष का जागृत होना.....एकमय होना.......सुसंगठित होना.......

इस जागरण और एकमय भावना को प्रसारित करने के संघर्ष में लाखों हिन्दू बंधु-बांधव और हमारे पूर्वजो ने अपने प्राणों की आहुतियां दी है......इसी जागरण और एकता के सूत्र में पिरोने का संकल्प ले "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" की नींव रखी गई......जो सार्थक और प्रभावी रूप से लोगो के अंतर्मन में राष्ट्रप्रेम,धर्मप्रेम एवं समर्पण,ऐसा कि सर्वस्व न्यौछावर कर दे........ऐसे भाव को भारतीय जनमानस में संचार कर उनके हृदय में अन्तरग्रहीत कराये.....

इसका प्रतिफल हमारे समक्ष है,कि वो एतिहासिक क्षण के हम साक्षी बन रहे है,जिनके लिए लाखों बलिदान हुए......."श्री रामचंद्र जी के मंदिर" का निर्माण अपने चरम पर है........

यह मंदिर केवल मात्र मंदिर नही है,बल्कि यह वह राष्ट्रमन्दिर है,जो हमे याद दिलाता रहेगा कि ये हमारी एकता का प्रतिफल है और सदैव भविष्य में इस भावना को जागृत करने हेतु प्रेरित करता रहेगा...........

तो लेख के लेखन का सार स्पष्ट है,कि हम यदि संगठित है......तो भारतवर्ष को विश्वगुरु बनने से कोई नही रोक सकता........

आपका:-कृपेन्द्र तिवारी

Thursday, December 17, 2020

गुरु घासीदास जयंती

#गुरु_घासीदास_जयंती
भारतीय समाज अनेकानेक वर्षो से फलीभूत रहा है...लेकिन समयचक्र में परिवर्तन के साथ समाज मे कुछ निम्न मानसिकताओं, अंधत्व,भेदभाव,समरसता का अभाव ने स्थान ले लिया...निश्चित ही ये विभिन्न कारक प्रगतिशील समाज के लिए घातक है.......इस हेतु समय-समय पर धार्मिक सुधार आंदोलन हुए....जिसमे 13-14 शताब्दी के मध्य भक्ति आंदोलन चरम पर था...ये धार्मिक आंदोलन धार्मिक जागरूकता फैलाने तथा धर्म के प्रति लोगो का ध्यान आकृष्ट करने का कारण बना...लेकिन इस समयकाल में भी कुछ संतो के द्वारा अपने रचनाओं में तात्कालिक समाज की कुरीतियो और उनकी जड़तारूपी दशा को इंगित कर उस पर कुठाराघात करने का भरसक प्रयास किया गया...जिसमे प्रमुख रूप से संत कबीर दास,तुलसीदास,नानक,दादूदयाल इत्यादि थे...जो सामाजिक सुधार के क्षेत्र में विशेष ध्यान एवं योगदान दिए.....

भारतीय समाज मे हुए अनेक आक्रमण,आतताइयों तथा कुछ प्रबुद्ध वर्ग(जो मात्र जाति से उच्च हो के साथ-साथ प्रत्येक वर्ग,जो सम्पन्न हो) के द्वारा हमारे समाज का शोषण तथा सामाजिक तानेबाने को ध्वस्त करने का प्रयास किया गया जो इस हेतु पूर्णरूपेण जिम्मेदार है......सामाजिक क्रांति के इसी कड़ी में  सन 1756 में छत्तीसगढ़ की पावन धरा में गिरौदपुरी(बलौदाबाजार) नामक स्थान में एक सामाजिक संत "गुरु घासीदास" जी का प्रादुर्भाव हुआ...

जिन्होंने भारतीय समाज मे व्यापित विकृतियो,जिसमे भेदभाव का स्थान चरम पर था,के उन्मूलन हेतु अविस्मरणीय योगदान दिए...बचपन से वैराग्य वृत्ति के धनी घासीदास जी ने सन 1820 में सतनाम पंथ की स्थापना की...जिसके अनुयायी "सतनामी" अर्थात "सत्य के नाम पर चलने वाला" कहलाये...

इन्होंने अपने मत में मूर्तिपूजा,समाज मे व्याप्त पशुबलि,हिंसा जैसे मान्यताओ को सिरे से नकार कर उनका विरोध किया...तथा अपने पंथ के अंतर्गत निम्नांकित 7 उपदेशो के माध्यम से सामाजिक क्रांति लाने का प्रयास किये...
1.मादक पदार्थ से परहेज
2.मांस भक्षण का परित्याग
3.सामाजिक समरसता के भाव का अंतर्ग्रहण
4.मूर्तिपूजा का विरोध
5.गयो से हल के माध्यम से जोताई बंद
6.दोपहर में हल चलाना बंद
7.सत्पुरुष सतनाम की निराकार उपासना.......आदि

आज इस पावन दिवस पर घासीदास जी के द्वारा दिये उपर्युक्त उपदेशो को हम जनमानस अपने जीवन मे किस स्तर पर अंतर्ग्रहित किये है...इस हेतु हमें मंथन करने की आवश्यकता है...जो गुरु घासीदास जी की जयंती को मनाने के लिए उचित कारण होगा,कि उनके उपदेश को आत्मसात कर सत्य के मार्ग पर चले और आज के समाज मे जागरूकता फैला सके...यही उनके जयंती पर हमारी सच्ची एवं निष्पक्ष भावार्पण होगी...

क्योकि आज समाज केआ भ्रष्टाचार,चोरी,झूठ के बुनियाद पे टिके होने से निवारण का उपाय मात्र...उनके उपदेशो का ससम्मान आचरण करना है.......यही प्रति हमारी सच्ची कृतज्ञता होगी ❤️❤️❤️💐💐💐🙏🙏🙏


#आपका:-कृपेन्द्र तिवारी

" VIP दर्शन व्यवस्था "

मंदिर की परिकल्पना ऐसे स्थल के रूप में सर्वविदित है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति,जो उस पद्धति पर विश्वास रखता है, निर्बाध रूप से अपनी उपासना कर सक...