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Tuesday, July 16, 2019

न्यायालय का दोहरा रवैया

                          रांची के एक व्यवहार न्यायालय के द्वारा एक हिन्दू धर्म से संबंध एवं आस्था रखने वाली लड़की को मात्र इस आधार पर की उसने सोशल मीडिया पर एक धर्म विशेष के कमियों को लेकर पोस्ट किया है,को जमानत के संगत 5 कुरान बाटने का दंड सुनाया गया।।

                          भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य निकाय के तीन भाग होते है
•विधायिका
•कार्यपालिका
•न्यायपालिका
इन सभी के सफल तथा निष्पक्ष क्रियान्वयन हेतु 'संविधान' सर्वोच्च है। भारतीय संविधान के मूल में 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द समाहित नही था,इसे संविधान की प्रस्तावना में 42वे संविधान संशोधन,1976 के द्वारा धर्मनिरपेक्ष(पंथनिरपेक्ष) शब्द समाहित किया गया,कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है जहाँ राज्य का कोई धर्म नही होगा,अर्थात उनका दृष्टिकोण धार्मिक न होकर केवल और केवल नागरिक के हित का होगा।।

                         राज्य के समस्त प्रजा को अनुच्छेद 25 के अनुसार किसी भी धर्म के अंतःकरण की स्वतंत्रता है तथा उसे मानने एवम अबाध रूप से प्रसारण करने की स्वतंत्रता है।इसमे स्पष्ट रूप से कहा गया है,कि उपर्युक्त अधिकार में स्वतंत्रता है ना कि परतंत्रता।
 
                          रांची कोर्ट के द्वारा दिया गया निर्णय क्या उस लड़की के मौलिक अधिकार पर अतिक्रमण नही है?

                          ये क्या न्याय पद्धति है? जो एक विशेष धर्म के लिए नत स्वभाव रख उस पर फैसले देने से पल्ला झाड़ती है और बहुसंख्यकों(हिन्दू) के द्वारा मानने वाले धर्म पर हस्तक्षेप पर  हस्तक्षेप..........उदाहरणतः - सबरीमाला मामला में हस्तक्षेप और निकाह हलाला धार्मिक मामला है।।

                          न्यायपालिका स्वतंत्र रहे इस उद्देश्य से ही संविधान निर्माताओं ने संविधान के भाग-4 के अनुच्छेद-50 में स्पष्ट रूप से कहा है,कि कार्यपालिका से न्यायपालिका पूर्णतः स्वतंत्र रहेगी ताकि वह किसी प्रकार से पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर अथवा किसी के पक्ष में होकर न्याय न करें।।
 
                          उपर्युक्त तथ्य इस निर्णय पर संविधान का नज़रिया प्रस्तुत कर रहा है,परंतु इस निर्णय का सामाजिक स्तर पर क्या प्रभाव पढ़ रहा है? उनकी नज़रिया क्या है?
  
                          हिन्दू धर्म एक सहिष्णु धर्म है,इसकी दुहाई देने की मैं कोई आवश्यकता नहीं समझता हूं,तो क्या इसके सहिष्णु होने की कीमत उसकी सहिष्णुता की परीक्षा लेना है?

                          सामान्यतः यह निर्णय न्यायालय पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है और हिन्दुओ की भावनाओ को भी आहत करती है।यदि देश मे यही निर्णय विशेष धर्म(मजहब) अर्थात 'अमन के प्रेमी साथियो' पर दिया गया होता तो,
•बहुसंख्यक असहिष्णु हो गये होते,
•अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार असुरक्षित हो गया होता
•समस्त मानवाधिकार संगठन मानवाधिकार की दुहाई देने लगते।
                            ऐसे अन्यान्य लांछनों के माध्यम से बहुसंख्यक समाज को निष्कृष्ट एवम असहिष्णु साबित करने का प्रयास किया जाता,जो वास्तव में कभी हुआ ही नही। तात्कालिक सरकार पर भी आक्षेप पर आक्षेप लगाए जाते,की देश को भगवाकृत करने का प्रयास किया जा रहा है,और जन-जन में सांघिक विचारधारा रूपी विष घोल जा रहा है।।

                         ऐसे परिप्रेक्ष्य में देश के न्यायालयीन गतिविधियो में बैठे न्यायमूर्ति,न्यायाधीश एवं दण्डाधिकारी को अपने पद का उत्तरदायित्व एवं इसकी अहमियत के प्रति जिम्मेदारी की रवैया अपनाना पड़ेगा तथा ऐसे निर्णयक्षमता के विकास करने की आवश्यकता होगी,जो निष्पक्ष,तर्कसंगत एवं न्यायपूर्ण हो,न कि साम्प्रदायिकता में वृद्धिकारक।।

                                                               :-कृपेन्द्र तिवारी
                              ।।जय हिंद।।

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