मंदिर में दूध चढ़ाए तो,दीनन की चिंता सताने लगी
मंदिर में पैसे चढ़ाए तो,अस्पताल की यादें आने लगी।
लेकिन नववर्ष की बेला में,गहमागहमी की ये रेला में
क्या किसी ने ऐसा सोचा कि,दे कंबल उन गलियारों में।
उन राहो में न चमकचांद,बस बिखरी है दीनता की आंध
राहो में नववर्ष मनाओ तुम,जिससे मीले असीमित सुकून
जो केक काटते राहो में,रंगरलियां हो चौक-बाजारों में
इन पैसों का संयोग करो,दिनन के सुख में उपयोग करो।।
तो सोचु क्यो मैं दूध चढ़ाऊँ,क्यो न उसे मैं बांट आउ
नर में श्रीहरि नारायण देख,इन भावो को मैं बिखराउ।
पहले तो ज्ञानवानियो खुद,ऐसे गुणो को जगाना तुम
तत्पश्चात सनातनियो को,सार्थक पाठ पढ़ाना तुम ।।
:-कृपेन्द्र तिवारी........✒️✒️✒️