Sunday, January 8, 2023
शुभम मैम जन्मदिवस
Friday, December 9, 2022
आजादी की अमर कहानी
आजादी की अमर कहानी चलो सुनाऊ क्या है वो
बलिदानों की चिर कथाएं, सुनो बताऊं क्या है वो
सतत समर्पण करते आये, जन्मभूमि के मण्डन में
प्राण दिए न्यौछावर सबने,मातृभूमि के वंदन में
ललक जगी थी मातृभूमि,को आजादी दिलवानी है
वीर सपूत सब जाग उठे,माँ की सम्मान बचानी है
क्या कोड़े,क्या फाँसी,सब यत्नों को सहते जाना है
एकबिंदु मनोचित्तवृत्ति से,नौका को पार लगाना है
बलिदानों की कोटि कथाएँ,नही संभव गिन पाने में
देश के कुछ नेता ही जाने,बलिदानों के खजाने में
नमन करे बलिदानों को,आजादी है दिलवाए वो
नेता जी ने बल पर अपने,हिन्द-फौज को खड़ा किया
क्रांति की ज्वाला को उसने,पाल-पोष कर बड़ा किया
नेता जी के नेतृ गुणों ने,गोरो को लोहा मनवाया था
हिटलर जैसे तानाशाही से,नेता कहकर बुलवाया था
नरमपंथी के नरम नीति को,सिरे से अस्वीकार किया
आजादी के लक्ष्यों पर केवल,मातृभूमि से प्यार किया
तुम खून दियो आजादी दूंगा,नेता जी ने चिल्लाया था
दिल्ली चलो का नारा देकर,दिल्ली भी बुलवाया था
सतत प्रयत्नों के बूते पर,जय-हिंद बुलवाए है वो
तिलककाल में राष्ट्रवाद की, ज्वालायें प्रस्फुटित हुए
खुदीराम,चाकी,सावरकर,जैसे योद्धा अवतरित हुए
जन्मसिद्ध अधिकार मान,स्वराज्य भाव को बड़ा किया
होमरूल जैसे प्रकल्प को,तिलक-बिसेन्ट ने खड़ा किया
मराठा-केसरी के गुंजो से,सत्ता को भीतरघात किया
लाल-बाल की तिकड़ी से,खतरा गोरो ने भांप लिया
गणपति-उत्सव,शिवा-जयंती,प्रारम्भ जिसने करवाया था
जय शिवाजी,गणपति बप्पा,नारा जिसने लगवाया था
वीरप्रतापी तिलक महोदय,वंदे मातरम कहवाये वो
राजगुरु,सुखदेव,भगतसिंह,फंदों पर हँसते झूल गए
मातृभूमि की रक्षा खातिर,घर-परिवार को भूल गए
सहज उम्र,समकक्षी अपने,प्राण दिए बलिदानी वो
गोरी-नीति से खूब लड़े,पर हार न माने अभिमानी वो
आजाद गए आजाद हुए हम,कैसे भूलेंगे कहानी वो
समरांगण पर सदैव स्वतंत्र,स्वतंत्र गए अभिमानी वो
मूँछे ताने गुर्राते,हम शेर भवानी के है वो
Friday, November 25, 2022
Wednesday, November 9, 2022
"कार्यक्षेत्र में प्रथम दिवस के लिए यात्रा और उसका अनुभव"
Tuesday, November 1, 2022
" छत्तीसगढ़िया,सबले बढ़िया "
Monday, October 31, 2022
"आरक्षण मामले का दंश झेल रहे छात्र "
Saturday, October 29, 2022
छठगीत गायन को लेकर आरु साहू का विरोध
प्रदेशवासियों के मध्य वर्तमान कालखण्ड में क्षेत्रीयता को लेकर एक विशेष वृत्ति,जिसे संज्ञात्मक रूप से "क्षेत्रवाद" कहा जाता है......यह प्रबलता से दृष्टिगोचर है.......
स्वयं की संस्कृति के प्रति गौरव एवं सम्मान की भावना निःसंदेह व्यक्ति की प्राथमिकता हो,इसमें कोई दो विचार नही है........लेकिन यह प्राथमिकता ही अंतिम(एको अहं द्वितीयो नास्ति) का पर्याय साबित हो,तो यह न तो उस संस्कृति और न ही उसके अनुयायी जनमानस के लिए हितकर साबित होगा......ऐसी संकीर्ण स्वभाव व्यक्ति की अस्वीकार्यता को इंगित करता है.......उनकी द्वयवृत्ति का परिचायक है.....
तात्कालिक परिप्रेक्ष्य में यह विचार इस कारण रखा जा है,कि छत्तीसगढ़ अंचल की सुप्रसिद्ध लोकगायिका सुश्री आरु साहू जी के द्वारा भारतभूमि के महापर्व के रूप में लब्धप्रतिष्ठ "छठपर्व" से संबंधित गीत का गायन किया गया........निश्चित ही हम सब प्रदेशवासियों के लिए गर्व का विषय होना चाहिए,कि हमारे अंचल की लोकगायिका के कला का दायरा(सीमा) इतना विस्तृत हो गया,कि वह छत्तीसगढ़ी के अतिरिक्त अन्य राज्यो से संबंधित गीतों का गायन कर रही है.........
इसी मध्य(बीच) प्रदेश के कुछ संगठन एवं समाज द्वारा उनके विरुद्ध #bycott का ट्रेंड चलाया जाने लगा.......जो इस नवपल्लवीत,समीपस्थ राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचो में स्थापित गायिका के लिए बाधा उत्पन्न कर रहे थे........
कला एक ऐसी विधा है,जिसमें धर्म,लिंग,वर्ण,भाषा,क्षेत्र की सीमा को आरोपित नही किया जा सकता है......और हमे उनके गायन को गर्व के विषय के रूप में आत्मसात करना चाहिए.......
यही पर हमारे दोगले मनोवृत्ति का पर्दाफ़ाश होता है,कि एक ओर हम ऋषि सुनक जी का ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद पर चुने जाने को लेकर प्रसन्न हो स्वयं को गर्वित भाव से पेश करने में किसी भी प्रकार का कसर नही छोड़ा है.......जो न तो पूर्णतः भारतीय है......न तो पूर्णतः भारतीय संस्कृति को आत्मसात किये हुए है.....अर्थात संबंद्धता नाममात्र का भी नही लेकिन उसको अपना बनाने की होड़ में हम सब इतने आगे........
वही दूसरी ओर सुश्री आरु साहू जी के द्वारा "छठगीत" गायन का विरोध मन मे अनेक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है.........कि क्या फिर
1.क्षेत्रवाद इतना ही श्रेष्ठ है.....?
2.अन्य परम्पराओ का सम्मान स्वीकार्य नही.....?
ऐसी वृत्ति हमारी असहिष्णुता का परिचायक है......जिसका त्याग अत्यंत आवश्यक है.......हम तो ऐसी संस्कृति के वाहक हैं, जो "वसुधैव कुटुम्बकम" आदर्शो को शिरोधार्य कर जीवनयापन करता है........हमे सभी संस्कृति के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए.......हमे ऐसे संकीर्ण भाव के दमन हेतु भरसक प्रयास और जागरूकता की आवश्यकता है........
इसी विचार के साथ आपका......😊
शानदार,ज़बरदस्त, जिंदाबाद.........सुश्री आरु साहू जी👍
" VIP दर्शन व्यवस्था "
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