आज के समाज को विद्वत पंडितो की आवश्यकता है,क्योकि बिना किसी तर्क के चली आ रही परंपरा आज के बुद्धजीवी वर्ग को रूढ़िवादी अथवा अंधविश्वास प्रतीत होती है........इस प्रकार,ऐसे ज्ञानवर्धन से सांकेतिक और प्रेरणादायी परंपरा मे रूढ़िवादी रूपी धूल,जो परत के रूप में जमी हुई है,जिससे यह उपयोगिताविहीन अथवा व्यर्थ लगती है,उस धूल के निवारण और स्वच्छिकरण हेतु आवश्यकता है............
क्योकि आज जनमानस का संस्कृत के प्रति विलगाव हो गया है,कारण भी सही है,कि संस्कृत के ज्ञान से हमे प्राप्त क्या होगा....???
तो संस्कृत के इस विमुखीकरण के दौर में संस्कृत की समझ किसे.......परंपरा की समझ किसे....??
तो ऐसे पंडितो/ब्राह्मणजनों की अनिवार्य आवश्यकता है,जो समाज को शास्त्ररूपेण मार्गदर्शित कर हमारे मन मस्तिष्क में बैठे समस्त शंशयो का निराकरण करे,जिससे हममे ऐसे अनमोल विरासत के प्रति लगाव तथा गर्व के भाव पैदा हो.........
प्राचीन समय में समाज का मार्गदर्शन ही ब्राह्मणों का कार्य हुआ करता था........जो आज के ब्राह्मणों में पण्डित्यता के अभाव में ऐसी बाते कही ओझल सी हो गई है,यही कारण है ब्राह्मण तात्कालिक समय में हास्य के पात्र तथा उनके द्वारा कराई जाने वाली कर्मकाण्ड आडंबर प्रतीत होता है............
इस निमित्त संस्कृति संरक्षण का समस्त कार्यभार केवल ब्राह्मण(जिनमे पांडित्य के गुण हो) के ऊपर ही टिकी हुई है.......👍👍
:-कृपेन्द्र तिवारी
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