Sunday, October 17, 2021

"75 दिनों का विश्वप्रसिद्ध दशहरा"

भारतीय परिक्षेत्र में दण्डकारण्य भूमि,जिसे आज हम सभी बस्तर के नाम से जानते हैं,प्रभु श्री राम जी के द्वारा सर्वाधिक समय व्यतीत किये गए स्थल के रूप में लब्धप्रतिष्ठित है। वर्तमान का बस्तर निश्चित ही देश में अपनी नक्सल गतिविधियों के कारण चर्चित रहता है,लेकिन हम बस्तर भूमि की समृद्ध जनजातीय एवं साझा सांस्कृतिक विरासत को नजरअंदाज नहीं कर सकते। जनजातीय संस्कृति में मुख्य रूप से विश्वप्रतिष्ठित बस्तर के दशहरा का स्थान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। चूँकि यह भारतीय परिवेश में मनाए जाने वाले दशहरा पर्व से पूर्णतः भिन्न होती है। जिसमें रामायण महाकाव्य के अनुसार,न तो रावण का दहन होता है और न ही प्रभु श्रीराम जी के विजय का उत्सव,बल्कि यह आश्विन मास शुक्लपक्ष दशमी को माँ दुर्गा जी के द्वारा सामान्य जनमानस के रक्षार्थ हेतु किए गए अत्याचारी महिषासुर के शिरोच्छेदन से संबंधित है। बस्तर में दुर्गा माता के रूप में माँ दंतेश्वरी की पूजा की जाती है। बस्तर का दशहरा,सामान्यतः मनाये जाने वाले एक दिन के दशहरे की अपेक्षा 75 दिनों तक चलने वाला पर्व है,जिसमें मनाया जाने वाला रस्म मुख्यत: अनवरत रूप से तेरह दिनों तक चलता है। 


इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बस्तर में आरुढ़ "काकतीय वंश" से जुड़ी हुई है। बस्तर रियासत के राजा "पुरुषोत्तम देव" के द्वारा पैदल मार्ग से चलकर जगन्नाथ पुरी की यात्रा की गई। यहां पुजारी ने राजा पुरषोत्तम देव के समर्पण भाव से प्रसन्न होकर उन्हें "रथपति" की उपाधि से विभूषित किया। जब पुरुषोत्तम देव का वापस बस्तर आगमन हुआ तो धूमधाम से बस्तर का दशहरा उत्सव मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई,तभी से "गोंचा" अर्थात दशहरा में रथचालन की परंपरा प्रारंभ हुई। 

छत्तीसगढ़ के अंचल में मनाए जाने वाले प्रकृति पूजन का पर्व "हरेली",जिसे श्रावण माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है,से 75 दिनों तक चलने वाली इस पर्व की शुरुआत "पाट जात्रा" कार्यक्रम से होता है। आमावस्या को माचकोट जंगल(बस्तर) से लाई गई सात लकड़ियों के गोला की पूजा की जाती है,तत्पश्चात सात "मांगुर मछलियों" की बलि चढ़ाई जाती हैं तथा लाई-चना अर्पित किया जाता है। इस लकड़ी से काष्ठकार्य में प्रयुक्त होने वाले औजार के बेंठ(हत्था) बनाकर रथनिर्माण की प्रक्रिया को प्रारंभ किया जाता है। रथ निर्माण का कार्य स्थानीय स्तर पर विशिष्ट ग्राम एवं समुदाय विशेष के व्यक्तियों द्वारा संपन्न किया जाता है। इस कार्य में श्रावण,भाद्रपद और आश्विन माह का प्रथम पक्ष(कृष्णपक्ष) व्यतीत हो जाता है। 


आश्विन शुक्ल पक्ष के प्रथम तिथि प्रतिपदा,जिससे नवरात्र प्रारंभ होता है,से प्रथम रस्म "काछिनगादी" प्रारंभ होती है,जिसमें एक विशिष्ट समुदाय "महरा" की कन्या को "काछिनदेवी" बनाकर गद्दी पर बैठाया जाता है,जो गद्दी विशेषत: बेल(बबूल) के कांटो से बनी होती है। आगे इस पर्व के सफलतापूर्वक संचालन एवं इसके निर्विघ्न समापन हेतु "हलबा" जनजाति के एक सदस्य को जोगी बनाकर,उसे 9 दिन का व्रत रखवाकर योग साधना में बैठाया जाता है,जिनके साधना का परिणाम दशहरा पर्व का निष्कंटक पूर्ण होना है। 

माता सती के दाँत के गिरने के कारण शक्तिपीठ के रूप में ख्याति प्राप्त "माँ दंतेश्वरी देवी" बस्तर की कुलदेवी है,जो इनकी आराधना का केंद्र बिंदु है। रथयात्रा में माँ दंतेश्वरी के छत्र को रथारूढ़ कर नगर भ्रमण कराया जाता है जिसके चारों ओर "गौर लोकनृत्य" करते हुए जनजाति समाज आनंदचित्त रहते हैं,इस गौर नृत्य को प्रसिद्ध मानवशास्त्री "वेरियर एल्विन" ने संसार का सबसे "सुंदरतम नृत्य" कहा है। इस प्रकार नौ दिन के नवरात्र पर्व के सफलतापूर्वक समापन पर "जोगी उठाई" कार्यक्रम किया जाता है,जिसमें नौ दिन पूर्व बैठे जोगी को विशेष भेंट अर्पण कर योग साधना से उठाया जाता है और जोगी उठाने के पश्चात दंतेवाड़ा में स्थित इष्ट देवी "मावली माता" को पालकी में बिठाकर बस्तर लाया जाता है जिसे चार माड़िया जाति के व्यक्तियों द्वारा कंधे से उठा कर लाया जाता है। 

आगे नवरात्र का समापन होता है तथा विजया दशमी तिथि को "भीतररैनी" अर्थात रथ को नगर के भीतर भ्रमण कराया जाता है और रथ को परिक्रमोपरांत प्रथा के अनुसार एक विशेष ग्राम "कुम्हड़ाकोट" ले जाते हैं,जहां सभी नागरिकों को रूमाल व बीड़ा(पान) देकर सम्मानित किया जाता है। विजयादशमी के पश्चात आश्विन शुक्ल एकादशी को ग्राम के राजा के द्वारा नवोदित अन्न को प्रसाद के रूप में माँ को समर्पित किया जाता है। 

पूरे पर्व का समापन समस्त समाज में समन्वय को स्थापित करने वाले बैठक के रूप में "मुड़िया दरबार" आयोजित किया जाता है,जिसका आयोजन बस्तर अंचल के राजा के द्वारा किया जाता है। जिसमें ग्राम वासियों की सामान्य समस्याओं पर चर्चा कर उसका निराकरण किया जाता है।इस प्रकार इस आयोजन के अंत में दंतेवाड़ा से लाई गई "मावली माता" को पुनः विदाई सम्मान देते हुए दंतेवाड़ा ले जाया जाता है जिसे स्थानीय स्तर पर "ओहाड़ी रस्म" कहते हैं। इस प्रकार विश्वप्रसिद्ध बस्तर के दशहरा उत्सव सम्पन्न होता है।

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