आप सभी मित्रो से कुछ सवाल
मेरा देश बदल रहा है,बदले भी क्यो न....क्योकि परिवर्तन ही संसार का नियम है।
लेकिन बदलाव ऐसा,कि अपनी संस्कृति,धरोहर,सनातन परंपरा,आदिकालीन विरासत में ही विकृति पैदा कर दे,क्या औचित्यपूर्ण है?
ये प्रश्न मनमस्तिष्क को विचलित कर देता है,कि हम स्वयं अपने ही धार्मिक आयोजन में,अनजाने से फूहड़ता,व्यभिचार,व्यसन आदि निष्कृष्ठ कृत्यों को स्थान दे जाते है...ऐसा क्यो?
आपकी राय....?
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