।।मेरे विचारों का यह लेख अवश्य पढ़ें।।
सोशल साइट्स(सामाजिक अंतरजाल) पर लोगों के स्टेटस(स्थिति) देख कर मन व्यथित एवं चिंतित हो उठा,कि हमारे देश में भी हिंदी भाषा का दिवस मनाया जाता है।
हमारे मन-मस्तिष्क में यह तथ्य पूर्व से विद्यमान है,कि कोई भी दिवस किसी संज्ञा विशेष के स्मरण अथवा उसके संरक्षण हेतु मनाया जाता है।
किसी भी देश का अस्तित्व उसकी संस्कृति में विद्यमान होती है।
इस संस्कृति के मुख्य अंग में से एक उसकी भाषा है।
हमारी संस्कृति हिंदुत्व(सनातन) तथा उसकी भाषा हिंदी है।
किसी विचारक,दार्शनिक ने कहा है,कि किसी देश के अस्तित्व का जड़ से अंत करना हो तो उसकी संस्कृति पर कुठाराघात किया जाए।
जो कि हमारे भारतीय इतिहास में मध्यकाल में मुस्लिम शासकों तथा आधुनिक काल में ब्रिटिश शासन के द्वारा किया गया।
इसी का परिणाम है,कि जो देश कभी विश्व गुरु हुआ करती थी और "वसुधैव कुटुंबकम्" अर्थात विश्व बंधुत्व के आदर्श को हृदय में संजो कर रखती थी आज वही देश आपस में सामाजिक रूप में संघर्षरत हैं।
अपनी मातृभाषा केवल ध्वनि के विनिमय का माध्यम ही नहीं बल्कि भाव,विचार,संवेदना के विनिमय का भी माध्यम होती है।
हमारे देश में राजनीतिज्ञों ने अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए देश हित को भी दांव पर लगा दिए, हमारे संविधान में वर्णित था,कि संविधान के लागू होने के 15 वर्ष पश्चात समस्त कार्यवाही चाहे वह उच्च न्यायालय,उच्चतम न्यायालय,संसद,विधानमंडल,स्थानीय निकाय,सरकारी,सहकारी एवं निजी निगमों में स्वतंत्रता से पूर्व चली आ रही भाषा के आधार पर कार्यवाही होगी तत्पश्चात हिंदी भाषा के माध्यम से कार्य संचालित होगी।
दुर्भाग्यवश हमारे तत्कालीन सत्ताधीश सरकार ने अंग्रेजी भाषा को "राजभाषा अधिनियम 1963" के तहत अनिश्चितकाल तक के लिए लागू कर दिया है।
एक मामला स्मरण में आता है,कि 1971 में एक याचिकाकर्ता द्वारा हिंदी में बहस के लिए "बंदी प्रत्यक्षीकरण' याचिका उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत किया गया परंतु न्यायालय ने इस याचिका को केवल इस आधार पर निरस्त कर दिया,कि वह अंग्रेजी में नहीं है अर्थात हिंदी का प्रयोग असंवैधानिक है।
जिस प्रकार आज के जनसाधारण को संस्कृत भाषा अति क्लिष्ट एवं व्यापक महसूस होती है तथा जिसे देवभाषा की संज्ञा दी जाती है अर्थात देवो के द्वारा बोली जाने वाली भाषा माना जाता है,वह कभी जनमानस की भाषा हुआ करती थी।
इसी प्रकार आज हिंदी भाषा के प्रति हम जागरुक न हुए और इसका संरक्षण कर उसे आत्मसात ना करें तो आने वाली पीढ़ियों को भी हिंदी देव भाषा अर्थात जन सामान्य की भाषा होने पर विश्वास नहीं होगा कि आमजन भी हिंदी भाषा में वार्तालाप करते थे।
:-कृपेन्द्र तिवारी
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