ज्ञात हो कि यह विधेयक पिछली बार 2016 में भी लोकसभा में प्रस्तुत हुई और एक गहमागहमी चर्चा के साथ पास भी हुई,लेकिन सत्ता पक्ष के पास राज्यसभा में बहुमत ना होने के कारण विधेयक लंबित हुए और अंततः लोकसभा के भंग(विघटन) होने से यह विधेयक समाप्त हो गई।
•क्या है,नागरिकता संशोधन विधेयक 2019?
यह विधेयक भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे पड़ोसी देशों (पाकिस्तान,अफगानिस्तान,बांग्लादेश) के नागरिको का भारत की नागरिकता ग्रहण से संबंधित है। इस विधेयक में प्रावधान है, कि पड़ोसी देशों में रह रहे प्रताड़ित अल्पसंख्यक समुदाय जैसे:- हिन्दू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध को भारत में शरणार्थी के रूप में बसा के उन्हें नागरिकता प्रदान करना। सामान्यतः पूर्व में नागरिकता ग्रहण हेतु उन्हें 11 वर्षों तक भारत में रहना अनिवार्य था,जो इस संशोधन के उसकी अवधि घटाकर 6 वर्ष के दी गई है। मौजूदा कानून के अनुसार भारत में अवैध रूप से दाखिल होने वाले व्यक्तियों को अपराध की सूची में रखा जाएगा जिससे उन्हें या तो उनके देश भेज दिया जाएगा अथवा भारत सरकार द्वारा हिरासत में रखा जाएगा।
•क्या CAB,2019 भारतीय नागरिकों की नागरिकता को प्रभावित करता है?
आपको स्पष्ट होना चाहिए, कि यह विधेयक भारतीय नागरिक के नागरिकता को ना प्रभावित कर,भारत में शरणार्थी के रूप में नागरिकता ग्रहण किए जाने वाले व्यक्तियों के मामले को प्रभावित करता है।
•क्या CAB,2019 भारतीय संविधान अनुच्छेद -14 का उल्लघंन करता है?
भारतीय संविधान की आत्मा तथा "मैग्नाकार्टा" कहीं जाने वाली उसकी भाग -3 "मौलिक अधिकार" हमें विविध प्रकार के अधिकार प्रदान करते है। जिसमें समानता के अधिकार के तहत अनु.-14,हमें विधि के समक्ष समानता एवं विधि का समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है।जिसमें उल्लेखित है, कि राज्य के द्वारा ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं किया जाएगा,जो जनमानस में विभेदता को उत्पन्न करे।
लेकिन वर्तमान विधेयक CAB,2019 इसका विरोध नहीं करती है,क्योंकि अनु.14 में राज्य को निर्देश है, कि राज्य भारतीय संप्रभुता,अखंडता अथवा न्याय(सामाजिक,शैक्षणिक आदि) को ध्यान रखते हुए विशेष उपबंध कर सकती है। जैसे:- निरपेक्ष स्थिति में तो आरक्षण का विषय भी समानता के अधिकार का उल्लघंन है और अनु.30 भी अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार प्रदान करता है,जो अनु.14 के मूल भावना का निरपेक्ष रूप से विरोध करता है। लेकिन संविधान में हमारे द्वारा पढ़े गए अनुच्छेदों में केवल एक पंक्ति मात्र होती है,जिसे हम अपने चित्त में रखकर दुहाई देना प्रारंभ करते है,जो वास्तविकता में पंक्ति मात्रा ना होकर इतनी वृहत होती है, कि प्रत्येक अनुच्छेद में एक किताब लिखी जा सकती है।
अंततः मै यही कहना चाहूंगा,कि यह बिल अनु.14 का विरोध उसी प्रकार नहीं करती जिस प्रकार आरक्षण।
•तो क्या कारण है, कि इसमें पड़ोसी देशों के मुसलमानों को स्थान नहीं दिया गया है?
लोकसभा में विधेयक पेश करने के पश्चात गृहमंत्री अमित शाह जी के द्वार पक्ष रखने पर हुए कांग्रेस द्वारा इसे धार्मिक आधार पर बनाया हुए विधेयक का मुद्दा उठाने पर शाह द्वारा आवेश में दो टूक जवाब दिया गया, कि "यदि आप सन 1947 में देश का धरना के आधार पर विभाजन नहीं करते तो आज हमे इस विधेयक को लाने आवश्यकता नहीं पड़ती।"
इस प्रश्न का कारण चिन्हांकित देशों में मुस्लिम समुदाय का बहुसंख्यक होना है,जिससे अल्पसंख्यक उत्पीड़ित होकर पलायन को मजबूर हो जाते है तथा शरणार्थी के रूप में भारत में शरण ग्रहण करते है।
भारत प्राचीनकाल से "वसुधैव कुटुंबकम्" के आदर्श का परिपालन करते हुए उसे आत्मसात करने को सदैव अग्रसर रहा है।जो शरणार्थियों प्र हमारी सहानुभूतिक स्वभावो का उदाहरण है।
इसे एक उदाहरणों के द्वारा समझ जा सकता है, कि यदि विषय किसी दुष्कर्म मामला में सहायता करने की हो तो आप पीड़िता की सहाइटा कर उसे आश्रय देंगे या उस गुनहगार को जो उन्हें उत्पीड़ित किया हो। इका ताजा उदाहरण तिब्बती शरणार्थियों का है, कि चीन के द्वारा उत्पीड़नों बौधविलंबियो भारत में शरण लेना है।
तो प्रश्न उठता है,की क्या चीनियों को भी नागरिकता दे? तो इसका उत्तर कभी नहीं होगा।
यही कारण है, कि मुसलमानों को इस विधेयक में स्थान नहीं दिया गया है।।
No comments:
Post a Comment