प्रदेशवासियों के मध्य वर्तमान कालखण्ड में क्षेत्रीयता को लेकर एक विशेष वृत्ति,जिसे संज्ञात्मक रूप से "क्षेत्रवाद" कहा जाता है......यह प्रबलता से दृष्टिगोचर है.......
स्वयं की संस्कृति के प्रति गौरव एवं सम्मान की भावना निःसंदेह व्यक्ति की प्राथमिकता हो,इसमें कोई दो विचार नही है........लेकिन यह प्राथमिकता ही अंतिम(एको अहं द्वितीयो नास्ति) का पर्याय साबित हो,तो यह न तो उस संस्कृति और न ही उसके अनुयायी जनमानस के लिए हितकर साबित होगा......ऐसी संकीर्ण स्वभाव व्यक्ति की अस्वीकार्यता को इंगित करता है.......उनकी द्वयवृत्ति का परिचायक है.....
तात्कालिक परिप्रेक्ष्य में यह विचार इस कारण रखा जा है,कि छत्तीसगढ़ अंचल की सुप्रसिद्ध लोकगायिका सुश्री आरु साहू जी के द्वारा भारतभूमि के महापर्व के रूप में लब्धप्रतिष्ठ "छठपर्व" से संबंधित गीत का गायन किया गया........निश्चित ही हम सब प्रदेशवासियों के लिए गर्व का विषय होना चाहिए,कि हमारे अंचल की लोकगायिका के कला का दायरा(सीमा) इतना विस्तृत हो गया,कि वह छत्तीसगढ़ी के अतिरिक्त अन्य राज्यो से संबंधित गीतों का गायन कर रही है.........
इसी मध्य(बीच) प्रदेश के कुछ संगठन एवं समाज द्वारा उनके विरुद्ध #bycott का ट्रेंड चलाया जाने लगा.......जो इस नवपल्लवीत,समीपस्थ राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचो में स्थापित गायिका के लिए बाधा उत्पन्न कर रहे थे........
कला एक ऐसी विधा है,जिसमें धर्म,लिंग,वर्ण,भाषा,क्षेत्र की सीमा को आरोपित नही किया जा सकता है......और हमे उनके गायन को गर्व के विषय के रूप में आत्मसात करना चाहिए.......
यही पर हमारे दोगले मनोवृत्ति का पर्दाफ़ाश होता है,कि एक ओर हम ऋषि सुनक जी का ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद पर चुने जाने को लेकर प्रसन्न हो स्वयं को गर्वित भाव से पेश करने में किसी भी प्रकार का कसर नही छोड़ा है.......जो न तो पूर्णतः भारतीय है......न तो पूर्णतः भारतीय संस्कृति को आत्मसात किये हुए है.....अर्थात संबंद्धता नाममात्र का भी नही लेकिन उसको अपना बनाने की होड़ में हम सब इतने आगे........
वही दूसरी ओर सुश्री आरु साहू जी के द्वारा "छठगीत" गायन का विरोध मन मे अनेक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है.........कि क्या फिर
1.क्षेत्रवाद इतना ही श्रेष्ठ है.....?
2.अन्य परम्पराओ का सम्मान स्वीकार्य नही.....?
ऐसी वृत्ति हमारी असहिष्णुता का परिचायक है......जिसका त्याग अत्यंत आवश्यक है.......हम तो ऐसी संस्कृति के वाहक हैं, जो "वसुधैव कुटुम्बकम" आदर्शो को शिरोधार्य कर जीवनयापन करता है........हमे सभी संस्कृति के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए.......हमे ऐसे संकीर्ण भाव के दमन हेतु भरसक प्रयास और जागरूकता की आवश्यकता है........
इसी विचार के साथ आपका......😊
शानदार,ज़बरदस्त, जिंदाबाद.........सुश्री आरु साहू जी👍
No comments:
Post a Comment