Friday, November 25, 2022

न्यूज़

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Wednesday, November 9, 2022

"कार्यक्षेत्र में प्रथम दिवस के लिए यात्रा और उसका अनुभव"



आज के दिवस का प्रारम्भ प्रातः काल मे 4:30 में हुआ। ये रहा अपने निज निवास पंडरिया से अपने कार्यक्षेत्र में गमन करने के लिए तैयारी का क्रम। कड़ाके के ठंड के दरमियाँ पूर्वाह्न 5:15 में पंडरिया से दुर्ग के छूटने वाली बस के लिए तैयार होकर सहशरीर 5:15 को पहुँचा ही था,कि बस 100 मीटर आगे निकल चुकी थी। ये एक संयोग मात्र ही था,कि बस के कंडक्टर के द्वारा वहाँ से बाइक में आगे बस में बैठने के लिए जाया जा रहा था। उन्होंने किसी चित-परिचित की भाँति मेरे मन की व्यथा को समझते हुए,मुझे अपने ही बाइक में बिना किसी ऐसे भाव के (मेरे बाइक में 3 लोग कैसे बैठेंगे) निःसंकोच बैठने के लिए कहा और बस में बैठाने/पकड़ाने में उनकी   महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह भी हो सकता है,कि वे अपने आर्थिक लाभ की दृष्टि से हमारी मदद किये,हो लेकिन जिस नेक उद्देश्य हेतु घर से पूजनीय माता-पिता जी के द्वारा मेरा विदा किया गया था। उस हेतु तो वे अतिधान्यवाद के पात्र है,अन्यथा वह उद्देश्य धरा का धरा रह जाता।

पूर्वाह्न 5:15 से चलने वाली बस का दुर्ग में 10:25 को पहुँचने में लगने वाला समय लगभग 5 घण्टा,10 मिनट का सफर का अधिकांश भाग शीतलहर से प्रभावित रहा और उससे बचते-बचते गर्मवस्त्र के आगोश में सोते हुए व्यतीत हुआ।

दुर्ग पहुँचने के पश्चात स्थानीय निज निवास पहुँचकर निजी वाहन से आदरणीय एवं सम्माननीय श्री गूगल मैप के माध्यम से सहायता प्राप्त करते हुए,वर्तमान में कार्यमुक्ति के पश्चात प्राप्त हुआ प्रथम निकाय "जनपद पंचायत,पाटन" में बड़े धूलधक्कड़ का सामना करते हुए पहुँचा।

पाटन का सम्बंध वर्तमान में हमारे राज्य के आदरणीय मुख्यमंत्री जी के गृहक्षेत्र से होने के कारण, इसकी छवि जिस प्रकार से मेरे मनमस्तिष्क में घर की हुई थी,उसको गहरा आघात पहुँचा। इस आघात का कारण यह रहा,कि मध्य मार्ग में पथनिर्माण कार्य के कारण हमे हुए परेशानी........धूल का गुबार ऐसा रहा,कि घर से बिना किसी मेकअप(साज-श्रृंगार) के मेकअप का आनंद प्राप्त हो गया।

जनपद पंचायत पाटन में पहुँचने पर क्षेत्रीय कार्यालय दुर्ग के द्वारा निर्धारित कार्यक्रमानुसार ज्येष्ठ संपरीक्षक आदरणीय श्री कमलेश कुमार सोनवानी के द्वारा मुझे इस कार्यालय से परिचित कराया गया। इस पल ही मन मे संकोच था,कि पहला दिवस में कफ्यले से सामंजस्य किस प्रकार बनाना है,लेकिन कुछ ही क्षण में सभी से परिचय पश्चात मैं स्वयं को अत्यंत सहज स्थिति में पाया,कि मैं अपने दुर्ग के ही कार्यालय में हूँ।

इसी क्रम में मेरे द्वारा अपने ज्येष्ठ अधिकारी जी को उपस्थिति पत्र प्रस्तुत किया गया। तत्पश्चात कार्य प्रशिक्षण का सत्र श्री सर के द्वारा लिया गया। प्रथम दिवस के मद्देनज़र ओझल की स्थिति से बचने के लिए तत्संबंधी सामान्य जानकारी ही प्रदान किया गया। जो मेरे लिए बिल्कुल ही नवीन था,यह एक विशेष अनुभव दिलाने वाला था। जो इस प्रकार था,जैसे कक्षा छठवी के बच्चे को संस्कृत सिखाया जा रहा है। कुछ चीजें हिंदी और संस्कृत में समरूपता के कारण जो समझ आता है,वैसे ही समझ आ रहे थे। तो कुछ ज्ञान लट्टलकार/लृट्टलकार की भाँति अत्यंत नवीन थे।


कुल मिलाकर यह दिवस एक जिज्ञाषु छात्र के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक रहा। जो जीवन के विशेष स्मरण के रूप में मनमस्तिष्क में अंकित हुआ।



Tuesday, November 1, 2022

" छत्तीसगढ़िया,सबले बढ़िया "

" छत्तीसगढ़िया,सबले बढ़िया "

उर्ध्वलिखित पंक्ति,जो छत्तीसगढ़वासियों के लिए स्वयं पर गर्व भाव को जागृत करने की पंक्ति है,की वर्तमान प्रासंगिकता किस स्तर की है.....??

क्या यह केवल नारा मात्र है......??
यह अपने में कौन-कौन से भाव को अन्तरग्रहीत किया हुआ है.....??

निःसंदेह स्वयं के किसी क्षेत्रविशेष से सम्बद्धता को लेकर व्यक्ति के मन मे गर्व का भाव होना सहज है......यह आपकी विशिष्टता के लिए भी आवश्यक है......उस क्षेत्र विशेष का नाम आपके व्यक्तित्व के आधार पर ख्यातिप्राप्त करें,इस हेतु भी महत्वपूर्ण है.........

उपर्युक्त बातो के इतर जब हम उस पंक्ति का उपयोग स्वयं की श्रेष्ठता के लिए करते है,तो क्या हम उसे समझ भी पाते है......कि क्या इस पंक्ति को कह देना बस ही,हमारे छत्तीसगढ़ के प्रति कृतज्ञता को व्यक्त करता है......??

प्रथमतः इस हेतु हमे इनके भाव को ग्रहण करते हुए,अपने में ऐसी क्षमता विकसित करना है,कि हम जिस क्षेत्र में हो,चाहे वह व्यापार-वाणिज्य,शिक्षा,कला,क्रीड़ा(खेल) आदि,उस क्षेत्र विशेष में नेतृवकर्ता रहें। जो लोगो के बीच मिसाल के रूप में पेश हो.......

द्वितीय: इस पंक्ति का प्रयोग करने का उद्देश्य,कदापि यह नही होना चाहिए,कि हम इससे दुसरो की निकृष्टता को सिद्ध करें.......शांतिप्रिय सहअस्तित्व की भावना हमारे संस्कृति का मूलाधार है......हमे सभी वर्गों,परंपराओं, संस्कृतियों के साथ "संगच्छद्वम् संवद्धवम्" के भाव से एकाकार होना चाहिए......ऐसे भाव ही पंक्ति की सार्थकता को सिद्ध करेगा......

तृतीय: हमारा प्रयास ही इस स्तर का हो,कि यह पंक्ति अपनी सार्वभौमिकता को प्राप्त करने की ओर अग्रसर हो.......यह अत्यंत प्रभावी तब होगा,जब इसे हमारे स्थान पर अन्य के द्वारा प्रयोग किया जाएगा.......जैसे कि व्यापार के क्षेत्र में गुजरात जैसे राज्य की स्थिति को हम सभी स्वीकार करते है......संस्कृति संरक्षण के मामले में दक्षिण भारत की स्थिति को स्वीकार करते है.......कुछ इसी तरह हमे अपनी क्षमता,स्वभाव से इस ओर प्रयास की आवश्यकता है.....

लेकिन दुविधा यह है,कि जो व्यक्ति इस पंक्ति को प्रयोग करता है,वह ही बड़े-बड़े मंचों,स्थानों या छत्तीसगढ़ से परे अन्य क्षेत्र में इसका प्रयोग करने से स्वयं को पृथक रखते है,उनमे छत्तीसगढ़ संस्कृति से स्वयं की सम्बद्धता प्रदर्शित करना हीनता का भाव पैदा करता है.......ऐसी वृत्ति का त्याग अत्यावश्यक है......इस हेतु हमे मराठा संस्कृति से सीख लेना चाहिए.......

इन्ही कुछ विचारो के साथ आप सभी को छत्तीसगढ़ निर्माण दिवस(राज्योत्सव) की अनेकानेक,गाड़ा-गाड़ा एवं असीमित शुभकामनाएं.......प्रयास करें हम सभी समृद्ध एवं नैतिक छत्तीसगढ़ निर्माण हेतु सतत प्रयत्नरत रहे.........

आपका......😊

" VIP दर्शन व्यवस्था "

मंदिर की परिकल्पना ऐसे स्थल के रूप में सर्वविदित है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति,जो उस पद्धति पर विश्वास रखता है, निर्बाध रूप से अपनी उपासना कर सक...