Tuesday, December 10, 2019
नागरिकता संशोधन बिल,2019: विपक्ष का बखेड़ा
Monday, December 9, 2019
हैदराबाद गैंगरेप:पुलिसिया एनकाउंटर
Sunday, September 15, 2019
हिंदी दिवस पर चिंतन
।।मेरे विचारों का यह लेख अवश्य पढ़ें।।
सोशल साइट्स(सामाजिक अंतरजाल) पर लोगों के स्टेटस(स्थिति) देख कर मन व्यथित एवं चिंतित हो उठा,कि हमारे देश में भी हिंदी भाषा का दिवस मनाया जाता है।
हमारे मन-मस्तिष्क में यह तथ्य पूर्व से विद्यमान है,कि कोई भी दिवस किसी संज्ञा विशेष के स्मरण अथवा उसके संरक्षण हेतु मनाया जाता है।
किसी भी देश का अस्तित्व उसकी संस्कृति में विद्यमान होती है।
इस संस्कृति के मुख्य अंग में से एक उसकी भाषा है।
हमारी संस्कृति हिंदुत्व(सनातन) तथा उसकी भाषा हिंदी है।
किसी विचारक,दार्शनिक ने कहा है,कि किसी देश के अस्तित्व का जड़ से अंत करना हो तो उसकी संस्कृति पर कुठाराघात किया जाए।
जो कि हमारे भारतीय इतिहास में मध्यकाल में मुस्लिम शासकों तथा आधुनिक काल में ब्रिटिश शासन के द्वारा किया गया।
इसी का परिणाम है,कि जो देश कभी विश्व गुरु हुआ करती थी और "वसुधैव कुटुंबकम्" अर्थात विश्व बंधुत्व के आदर्श को हृदय में संजो कर रखती थी आज वही देश आपस में सामाजिक रूप में संघर्षरत हैं।
अपनी मातृभाषा केवल ध्वनि के विनिमय का माध्यम ही नहीं बल्कि भाव,विचार,संवेदना के विनिमय का भी माध्यम होती है।
हमारे देश में राजनीतिज्ञों ने अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए देश हित को भी दांव पर लगा दिए, हमारे संविधान में वर्णित था,कि संविधान के लागू होने के 15 वर्ष पश्चात समस्त कार्यवाही चाहे वह उच्च न्यायालय,उच्चतम न्यायालय,संसद,विधानमंडल,स्थानीय निकाय,सरकारी,सहकारी एवं निजी निगमों में स्वतंत्रता से पूर्व चली आ रही भाषा के आधार पर कार्यवाही होगी तत्पश्चात हिंदी भाषा के माध्यम से कार्य संचालित होगी।
दुर्भाग्यवश हमारे तत्कालीन सत्ताधीश सरकार ने अंग्रेजी भाषा को "राजभाषा अधिनियम 1963" के तहत अनिश्चितकाल तक के लिए लागू कर दिया है।
एक मामला स्मरण में आता है,कि 1971 में एक याचिकाकर्ता द्वारा हिंदी में बहस के लिए "बंदी प्रत्यक्षीकरण' याचिका उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत किया गया परंतु न्यायालय ने इस याचिका को केवल इस आधार पर निरस्त कर दिया,कि वह अंग्रेजी में नहीं है अर्थात हिंदी का प्रयोग असंवैधानिक है।
जिस प्रकार आज के जनसाधारण को संस्कृत भाषा अति क्लिष्ट एवं व्यापक महसूस होती है तथा जिसे देवभाषा की संज्ञा दी जाती है अर्थात देवो के द्वारा बोली जाने वाली भाषा माना जाता है,वह कभी जनमानस की भाषा हुआ करती थी।
इसी प्रकार आज हिंदी भाषा के प्रति हम जागरुक न हुए और इसका संरक्षण कर उसे आत्मसात ना करें तो आने वाली पीढ़ियों को भी हिंदी देव भाषा अर्थात जन सामान्य की भाषा होने पर विश्वास नहीं होगा कि आमजन भी हिंदी भाषा में वार्तालाप करते थे।
:-कृपेन्द्र तिवारी
Thursday, September 12, 2019
धार्मिक आयोजनों पर चिंतन
आप सभी मित्रो से कुछ सवाल
मेरा देश बदल रहा है,बदले भी क्यो न....क्योकि परिवर्तन ही संसार का नियम है।
लेकिन बदलाव ऐसा,कि अपनी संस्कृति,धरोहर,सनातन परंपरा,आदिकालीन विरासत में ही विकृति पैदा कर दे,क्या औचित्यपूर्ण है?
ये प्रश्न मनमस्तिष्क को विचलित कर देता है,कि हम स्वयं अपने ही धार्मिक आयोजन में,अनजाने से फूहड़ता,व्यभिचार,व्यसन आदि निष्कृष्ठ कृत्यों को स्थान दे जाते है...ऐसा क्यो?
आपकी राय....?
Saturday, September 7, 2019
नमन
असंभव रूपी पृष्ठों पर अमिट स्याही से संभव की गाथा लिखने तथा हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम को ब्रम्हांड में अनंत की नौका में यात्रा करा विश्व-जगत में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर भारत के गौरव में उन्नतिकारक उन सभी महान विभूतियों को नमन.............
Wednesday, September 4, 2019
शिक्षक
गुरु का मानवीय जीवन में वह स्थान है,जो मूर्ति निर्माण में एक शिल्पकार का होता है,जिस प्रकार एक शिल्पकार पत्थरो पर चोट करता हुए एक सजीव रूपक आकृति प्रदान करता है,उसी प्रकार एक शिक्षक अथवा गुरु हमारे जीवन अथवा आचरण में व्यापित गुण-दोषों का विवेचन कर उसे दूर करने में अग्रणी भूमिका निभाते है । जिस प्रकार दीपक स्वयं प्रकाशित हो अन्यत्र को प्रकाशमान करता है,लेकिन दिया तले अंधेरा तो रहता ही है,उसी प्रकार शिक्षक स्वयं की महत्वाकांक्षा को दूर रखते हुए,छात्र की सफलता अर्थात उनके जीवन को प्रकाशित करना चाहता है । लेकिन इस गुरु शिष्य परंपरा का चिंतन किया जाए तो अंतर्मन में एक प्रश्न गुंजित हो उठता है,कि क्या वर्तमान समयो में वो गुरु शिष्य परंपरा का अस्तित्व आज भी विद्यमान है,जिसे हम गुरुकुल परंपरा कहते थे,जिससे आप सभी परिचित ही होंगे............और यह चिंता की ही बात है,कि शिक्षा के व्यवसायीकरण इस दौर में इस परंपरा की छवि गंगा-यमुना त्रिवेणी संगम की लहरों में विलुप्तप्राय माँ सरस्वती जैसा प्रतीत होती है।।
हम बड़े सौभाग्यशाली है,कि हमे गुरुकुल शिक्षण संस्थान जैसे विद्या मंदिर में अध्ययन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है,जहा आज भी शिक्षक गुरुकुल परंपरा की निर्वहन करते हुए प्रत्येक छात्र को ध्यान में रखकर उनको विषयगत ज्ञान प्रदान करने के अतिरिक्त बौध्दिक,नैतिक एवं सांस्कृतिक रूप से सुदृण बनाते है। ऐसे शिक्षण संस्थान जहा आज भी हमारे सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पर्वो को धूमधाम से आयोजित कर अपने परम्परा के प्रति कृतज्ञता के भाव अर्पित करते है।।
शिक्षक,जो मानवीय जीवन के उज्जवल भविष्य की दिशा एवं दशा निर्धारित करते है।
वो शिक्षक ही होते है,जो माता-पिता के बाद हमे स्वयं से बड़ा बनाने की महत्वाकांक्षा रखते है।।
:-कृपेन्द्र तिवारी
Monday, August 26, 2019
अन्याय के विरुद्ध जागरूक होने का समय
मेरा व्यक्तिगत मानना और अभी तक के सामान्यजन के विभिन्न माध्यम से प्रतिक्रया का निरीक्षण करने से ज्ञात हुआ है,कि सभी आंदोलन,रैली एवं प्रदर्शन का नेतृत्व मुख्य रूप से युवा वर्ग के द्वारा किया गया है।
आगे आवश्यकता है,कि हमारे समाज के सभी वरिष्ठजनो को प्रत्यक्ष रूप से सामने आकर इसका विरोध करना चाहिए।
सामान्यतः अधिकतर लोगों का सोचना होता है,कि हमारा तो धंधा-पानी मस्त है हमे विरोध करने से क्या लाभ होगा,परंतु आगे हमारी पीढ़ी को ही इसका दंश झेलना पड़ेगा,तो जागृग होने का समय अभी ही है, "अब नही तो कभी नही" के भाव मन मे लेकर झूझने का समय है। इसी प्रकार की सोच कुछ नौकरशाहों की होती है..........जो ही सत्ता पर बैठे लोगो को ऐसी हिम्मत प्रदान करता है,की वो ऐसी निर्णय ले सके।।
और हमारे समाज के नेताओ की बात ही छोड़िये............कल के टीएस सिहदेव जी के बयान,कि "सामान्य इस राज्य में 6% है,तो आरक्षण तो 72% से भी बढ़ना चाहिए।" उनके इस अनारक्षित विरोधी बातो को उनके बगल में ही बिलासपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक शैलेश पांडेय जी बड़े ही चाटुकारिता के भाव से सुन रहे थे। ऐसी निर्लज्जता..................विचारणीय है,चिंतनीय है।
:-कृपेन्द्र तिवारी
" VIP दर्शन व्यवस्था "
मंदिर की परिकल्पना ऐसे स्थल के रूप में सर्वविदित है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति,जो उस पद्धति पर विश्वास रखता है, निर्बाध रूप से अपनी उपासना कर सक...

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क्रिकेट के मक्का लार्ड्स के मैदान में हो रहे,क्रिकेट विश्वकप मैच २०१९ के फाइनल मैच को देखकर शायद ही कोई ऐसा बंदा रहा हो...
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मेरे जीवन का प्रथम शासकीय नियोजन हुआ,जिसका स्थान रहा छत्तीसगढ़ राज्य संपरीक्षा,क्षेत्रीय कार्यालय,दुर्ग........इस कार्यालय अथवा कार्यक्षेत्र ...
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