Tuesday, October 13, 2020
जन्मदिवस शुभकामनाये..... दीवान सर.....
Saturday, September 5, 2020
गुरु
Saturday, April 25, 2020
अनिश्चितताओं का खेल क्रिकेट:-ICC के पास निर्णय क्षमता का अभाव
क्रिकेट के मक्का लार्ड्स के मैदान में हो रहे,क्रिकेट विश्वकप मैच २०१९ के फाइनल मैच को देखकर शायद ही कोई ऐसा बंदा रहा होगा,जिसका रोम-रोम रोमांचित न हुआ हो।वास्तव में यह मैच विश्वकप के अंतिम मुकाबले होने की सार्थकता की भूमिका बखूबी निभा रहा था।।
प्रारंभिक स्थिति में तो मैच के प्रथम पारी के रन को देखकर इंग्लैंड का पड़ला भारी लगने लगा,फिर प्रक्रिया-दर-प्रक्रिया मैच के दूसरी पारी में जो अनिश्चितता का दौर प्रारंभ हुआ वो थमने का नाम ही नहीं लिया और अंतिम दौर तक बरकरार रहा।ये अनिश्चितता 50 ओवर के पूरा होने के बाद भी बन रहा।निर्णायक स्थिति प्राप्त ना होने पर अंततः सुपर ओवर से मैच का निर्णय लेने का फैसला किया गया।।
दोनों देश के खिलाड़ियों का जज्बा ऐसा रहा, कि दोनों ही अपने-अपने देश को विश्वकप दिलाने हेतु प्रतिबद्ध होकर प्रदर्शन किए। करे भी क्यों ना,क्योंकि इंग्लैंड को 3 बार 1975,1979,1992 के फाइनल पहुंच कर हार का सामना करना पड़ा था,वहीं न्यूजीलैंड का ये हृदय की ज्वाला कोई पुराना नहीं था,पिछले वर्ल्ड कप 2015 में ऑस्ट्रेलिया के हाथों हार हुई थी,दोनों का ही सपना,कि अपने देश को पहला विश्वकप दिलाना है।।
सुपर ओवर में इंग्लैंड ने उम्दा प्रदर्शन करते हुए एक ओवर में 2 बाउंड्री के सहयोग से 15 रन बना कर न्यूजीलैंड को 16 रन का लक्ष्य दिया,न्यूजीलैंड ने भी लक्ष्य का पीछा करते हुए एक बाउंड्री(छक्का) की मदद से 15 रन ही बतौर पाई।।
वास्तव में यदि क्रिकेट के नियमो से अनभिज्ञ व्यक्ति वहां बैठा हो तो उसके लिए पुन वहीं स्थिति निर्मित हो गई जो मैच के 50 ओवर के समाप्ति होने पर हुआ था उसके अनुसार सुपर ओवर के बाद भी कोई मैच नहीं जीता है,परन्तु ICC के नियमो के अनुरूप यह मैच इंग्लैंड जीत चुका था,न्यूजीलैंड का सपना मात्र सपना रह गया।।
ICC के इन ओछी किस्म के निर्णयों से ICC का पूरा नाम international cricket council के स्थान पर international comedy council रख देना चाहिए।।
एक सामान्य से मैच में हजारों लाखो लोगो की भावनाएं समाहित एवम नज़रे आशान्वित होती है,लेकिन ये तो क्रिकेट के सबसे बड़े स्तर world cup 2019 का फाइनल मुकाबला था।दोनों देश में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति रहा होगा,जिसे इससे मतलब ना हो।।
अंततः ICC को ऐसे निर्णयों से बचना चाहिए, कि इतने बड़े मैच का निर्णय चौके-छक्के की संख्या से दे।
मेरे अनुसार सर्वमान्य निर्णय यही होता,कि दोनों देशों को सह विजेता घोषित किया जाता।
:- कृपेंद्र तिवारी
।। जय हिन्द ।।
Tuesday, December 10, 2019
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Monday, December 9, 2019
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Sunday, September 15, 2019
हिंदी दिवस पर चिंतन
।।मेरे विचारों का यह लेख अवश्य पढ़ें।।
सोशल साइट्स(सामाजिक अंतरजाल) पर लोगों के स्टेटस(स्थिति) देख कर मन व्यथित एवं चिंतित हो उठा,कि हमारे देश में भी हिंदी भाषा का दिवस मनाया जाता है।
हमारे मन-मस्तिष्क में यह तथ्य पूर्व से विद्यमान है,कि कोई भी दिवस किसी संज्ञा विशेष के स्मरण अथवा उसके संरक्षण हेतु मनाया जाता है।
किसी भी देश का अस्तित्व उसकी संस्कृति में विद्यमान होती है।
इस संस्कृति के मुख्य अंग में से एक उसकी भाषा है।
हमारी संस्कृति हिंदुत्व(सनातन) तथा उसकी भाषा हिंदी है।
किसी विचारक,दार्शनिक ने कहा है,कि किसी देश के अस्तित्व का जड़ से अंत करना हो तो उसकी संस्कृति पर कुठाराघात किया जाए।
जो कि हमारे भारतीय इतिहास में मध्यकाल में मुस्लिम शासकों तथा आधुनिक काल में ब्रिटिश शासन के द्वारा किया गया।
इसी का परिणाम है,कि जो देश कभी विश्व गुरु हुआ करती थी और "वसुधैव कुटुंबकम्" अर्थात विश्व बंधुत्व के आदर्श को हृदय में संजो कर रखती थी आज वही देश आपस में सामाजिक रूप में संघर्षरत हैं।
अपनी मातृभाषा केवल ध्वनि के विनिमय का माध्यम ही नहीं बल्कि भाव,विचार,संवेदना के विनिमय का भी माध्यम होती है।
हमारे देश में राजनीतिज्ञों ने अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए देश हित को भी दांव पर लगा दिए, हमारे संविधान में वर्णित था,कि संविधान के लागू होने के 15 वर्ष पश्चात समस्त कार्यवाही चाहे वह उच्च न्यायालय,उच्चतम न्यायालय,संसद,विधानमंडल,स्थानीय निकाय,सरकारी,सहकारी एवं निजी निगमों में स्वतंत्रता से पूर्व चली आ रही भाषा के आधार पर कार्यवाही होगी तत्पश्चात हिंदी भाषा के माध्यम से कार्य संचालित होगी।
दुर्भाग्यवश हमारे तत्कालीन सत्ताधीश सरकार ने अंग्रेजी भाषा को "राजभाषा अधिनियम 1963" के तहत अनिश्चितकाल तक के लिए लागू कर दिया है।
एक मामला स्मरण में आता है,कि 1971 में एक याचिकाकर्ता द्वारा हिंदी में बहस के लिए "बंदी प्रत्यक्षीकरण' याचिका उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत किया गया परंतु न्यायालय ने इस याचिका को केवल इस आधार पर निरस्त कर दिया,कि वह अंग्रेजी में नहीं है अर्थात हिंदी का प्रयोग असंवैधानिक है।
जिस प्रकार आज के जनसाधारण को संस्कृत भाषा अति क्लिष्ट एवं व्यापक महसूस होती है तथा जिसे देवभाषा की संज्ञा दी जाती है अर्थात देवो के द्वारा बोली जाने वाली भाषा माना जाता है,वह कभी जनमानस की भाषा हुआ करती थी।
इसी प्रकार आज हिंदी भाषा के प्रति हम जागरुक न हुए और इसका संरक्षण कर उसे आत्मसात ना करें तो आने वाली पीढ़ियों को भी हिंदी देव भाषा अर्थात जन सामान्य की भाषा होने पर विश्वास नहीं होगा कि आमजन भी हिंदी भाषा में वार्तालाप करते थे।
:-कृपेन्द्र तिवारी
" VIP दर्शन व्यवस्था "
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