Tuesday, October 13, 2020

जन्मदिवस शुभकामनाये..... दीवान सर.....

शासकीय ई. राघवेन्द्र राव स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय में सुचना प्रद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष,विज्ञान महाविद्यालय में ज्ञानार्जन हेतु आगंतुक नवपल्लवीत पुष्परूपी छात्रों के लिए एक ऐसे प्रेरणा पुंज,जिससे प्रकाशित होकर छात्र इस विशाल चराचर,प्रतिस्पर्धात्मक भौतिक जगत के आभामंडल में एक सूक्ष्म तारा (जो स्वयं प्रकाशित होने में सक्षम हो) का अतित्व स्थापित कर पाता है.........


ऐसे गुरु,जो महाविद्यालयीन सीमा को उल्लंघित कर प्रत्येक छात्र(जिसको एक मात्र सहारे की तलाश हो) को अपने प्रेरणास्पद वचनों से छात्रो को अपने इस सूक्ष्मतम जीवन मे उन विशालतम उचाईयो को प्राप्त करने के लिए(जिसकी परिकल्पना छात्रजीवन में करना,मात्र एक काल्पनिक कथा हो) मार्गदर्शित एवं प्रेरित करती है............


एक ऐसे नेतृत्वकर्ता,जिनके नेतृत्व की प्रामाणिकता इस तथ्य से अनुभवित किया जा सकता है,कि उनका कार्यभार अर्थात जिम्मेदारियों का दायरा क्या रहा है......इसकी चर्चा करना मात्र चर्चा की अनंतता को इंगित करता है अर्थात ऐसी चर्चा जिसका अंत न हो........इसका उदाहरण महाविद्यालयीन स्तर पर हो या चाहे अन्य क्षेत्र में हो..........चाहे वह सूचना प्रद्योगिकी विभाग के विभाध्यक के पद का संचालन करना हो या ऐसे शासकीय संगठन(जिसका उद्देश्य समाज के निर्माण करने वाले स्वयंसेवको का निर्माण करना हो)NSS,NCC के जिम्मेदारियों का पालन राष्ट्रीयता के भावना से परिपूरित होकर करना,जिससे यह स्वयंसेवक आगे समाज को एक स्वस्थ,सुगम एवं स्वत्रंतता रूपी दिशा में संचालित करे.........चाहे वह राज्य सरकार के निर्वाचन आयोग(जिसका निर्वाचन सम्पन्न कराने में सर्वोच्च स्थान है) में मास्टर ट्रेनर की भूमिका के रूप में प्रशिक्षण का कार्य हो.......ऐसी अनंत कार्य है.....जिनकी चर्चाएं अनंत है.......


एक ऐसे समाज सेवक,जो निर्विकार भाव से सदैव समर्पित होकर उसकी उन्नति हेतु प्रयत्नरत रहते है.......समाज के प्रति उनका समर्पण का अंदाजा बौद्धिक(शैक्षणिक),आर्थिक,शारीरिक एवं मानसिक रूप से संलिप्तता के दर्शन मात्र से लगाया जा सकता है..........सामाजिक दायर ऐसा कि, विश्व के सबसे बड़े संगठन के जिला स्तर पर छात्रों का प्रतिनिधित्व करते है.............


मेरे व्यक्तिगत जीवन मे....महाविद्यालय में प्रवेश के कुछ समय मे सम्पर्कित होने के पश्चात(ऐसे शिक्षक,जिनसे न चाहते हुए छात्र उनकी आभा से आकर्षित हो जाये,कुछ इसी प्रकार सर के संपर्क में आने के पश्चात) से लेकर सम्पूर्ण महाविद्यालयीन सफर में बिलासपुर जैसे अनजान जगहों पर एक जिम्मेदार पालक के दायित्व का निर्वहन करने के साथ,पितातुल्यता के भाव से प्रेरित एवं मार्गदर्शित कर जीवन पथ पर शास्वत रूप से कंटकाकीर्ण मार्गों के कांटो को अपने पुरुषार्थो से दूर करते हुए.........गतिमान होने हेतु प्रेरित करते है.......वो भी केवल मात्र एक निर्विकार एवं निस्वार्थ आकांक्षा,कि मेरे छात्र मानवीय जीवन के असीमित उचाईयो को(जो मानवीय कल्पनाओ में अस्तित्व रखता है)प्राप्त कर सके...........


ऐसे आदरणीय,सम्माननीय एवं पूज्यनीय गुरुवर,आचार्य श्री तरुणधर दीवान सर जी को उनके जन्मदिवस के इस शुभ एवं आंनदित अवसर पर हृदय की अन्तरतल से उद्वेलित भाव से अनंत,असीमित एवं अपर शुभकामनाये........💐🎂💐🎂



 ब्रम्हांड की समस्त ऊर्जाओं एवं शक्तियों से यही निवेदन की आप इसी प्रकार सफलता के असीम उचाईयो की प्राप्ति हेतु.....सदैव अग्रसर रहे एवं सफलता प्राप्त करते रहे......जिससे हमें गर्वित होने का अवसर प्राप्त होता रहे और हम भी आपके अनुगामी बन सके............आपके स्नेह एवं आशीर्वाद रूपी छाया हम पर सदैव आच्छादित हो..........इन्ही कामनाओ के साथ प्रणाम एवं सादर चरणस्पर्श सर.....🥰🥰❤️❤️


आपका अपना:- कृपेन्द्र तिवारी

Saturday, September 5, 2020

गुरु

दिप सम प्रज्वलित होकर,हरण करें तम अंधकार।
माली बन सींचे कमल सम,उस गुरु के हम कर्जदार।।

:-कृपेन्द्र तिवारी

Saturday, April 25, 2020

आज देश में तथाकथित "संविधान के रक्षक" की गुटबाज़ी की नीति इतनी शक्तिशाली हो गई है,जिससे बड़े बड़े महारथी भी लोहा लेने से डरते है। और यह लोहा ना लेना सामान्य जनमानस की चुप्पी है। यह चुप्पी इस स्तर पर है, कि सत्ता पक्ष(केंद्रीय) भी इनसे तौबा करना ही अपनी भलमनसाहत समझती है। 

इन ऊंचे ओहदे पर बैठे लोगों के द्वारा अपनी विचारधारा के अनुकूल एक एजेंडा निर्धारित किया जाता है, जिसे फिर सामाजिक अंतर्जाल(सोशल साइट) के माध्यम से प्रसारित किया जाता है। और इस एजेंडा के वाहक होते है हमारे ही अपने बीच के "तथाकथित धर्मनिरपेक्ष" लोग.........

सामान्यतः देश में घटनाएं होती रहती है, उस पर देश के मानस अपनी चेतना की सामर्थ्यता के अनुसार अपना पक्ष रखता है,जो कि चर्चा का विषय रहता है,और इसी चर्चा के विषय को अपने पक्ष में रखने के लिए "संविधान के रक्षक" और "तथाकथित धर्मनिरपेक्ष" लोग एजेंडा निर्धारित करते है। और इसे पूरे जोरों शोरों से,एक मजबूत लॉबी के माध्यम से देश के सम्मुख पेश किया जाता है।

इस विषय पर स्वयं के अंतर्मन कि व्यथा को पेश करने का विचार मन में तब आया,जब पालघर में साधुओं कि जघन्य और निर्ममता पूर्ण हत्या पर उपर्युक्त वर्णित लॉबी के द्वारा मौन साधना तथा उसे चोर घोषित किया जाने लगा।

अनिश्चितताओं का खेल क्रिकेट:-ICC के पास निर्णय क्षमता का अभाव

                     क्रिकेट के मक्का लार्ड्स के मैदान में हो रहे,क्रिकेट विश्वकप मैच २०१९ के फाइनल मैच को देखकर शायद ही कोई ऐसा बंदा रहा होगा,जिसका रोम-रोम रोमांचित न हुआ हो।वास्तव में यह मैच विश्वकप के अंतिम मुकाबले होने की सार्थकता की भूमिका बखूबी निभा रहा था।।

                     प्रारंभिक स्थिति में तो मैच के प्रथम पारी के रन को देखकर इंग्लैंड का पड़ला भारी लगने लगा,फिर प्रक्रिया-दर-प्रक्रिया मैच के दूसरी पारी में जो अनिश्चितता का दौर प्रारंभ हुआ वो थमने का नाम ही नहीं लिया और अंतिम दौर तक बरकरार रहा।ये अनिश्चितता 50 ओवर के पूरा होने के बाद भी बन रहा।निर्णायक स्थिति प्राप्त ना होने पर अंततः सुपर ओवर से मैच का निर्णय लेने का फैसला किया गया।।

                      दोनों देश के खिलाड़ियों का जज्बा ऐसा रहा, कि दोनों ही अपने-अपने देश को विश्वकप दिलाने हेतु प्रतिबद्ध होकर प्रदर्शन किए। करे भी क्यों ना,क्योंकि इंग्लैंड को 3 बार 1975,1979,1992 के फाइनल पहुंच कर हार का सामना करना पड़ा था,वहीं न्यूजीलैंड का ये हृदय की ज्वाला कोई पुराना नहीं था,पिछले वर्ल्ड कप 2015 में ऑस्ट्रेलिया के हाथों हार हुई थी,दोनों का ही सपना,कि अपने देश को पहला विश्वकप दिलाना है।।

                      सुपर ओवर में इंग्लैंड ने उम्दा प्रदर्शन करते हुए एक ओवर में 2 बाउंड्री के सहयोग से 15 रन बना कर न्यूजीलैंड को 16 रन का लक्ष्य दिया,न्यूजीलैंड ने भी लक्ष्य का पीछा करते हुए एक बाउंड्री(छक्का) की मदद से 15 रन ही बतौर पाई।।

                     वास्तव में यदि क्रिकेट के नियमो से अनभिज्ञ व्यक्ति वहां बैठा हो तो उसके लिए पुन वहीं स्थिति निर्मित हो गई जो मैच के 50 ओवर के समाप्ति होने पर हुआ था उसके  अनुसार सुपर ओवर के बाद भी कोई मैच नहीं जीता है,परन्तु ICC के नियमो के अनुरूप यह मैच इंग्लैंड जीत चुका था,न्यूजीलैंड का सपना मात्र सपना रह गया।।

                      ICC के इन ओछी किस्म के निर्णयों से ICC का पूरा नाम international cricket council के स्थान पर international comedy council रख देना चाहिए।।

                      एक सामान्य से मैच में हजारों लाखो लोगो की भावनाएं समाहित एवम नज़रे आशान्वित होती है,लेकिन ये तो क्रिकेट के सबसे बड़े स्तर world cup 2019 का फाइनल मुकाबला था।दोनों देश में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति रहा होगा,जिसे इससे मतलब ना हो।।

                     अंततः ICC को ऐसे निर्णयों से बचना चाहिए, कि इतने बड़े मैच का निर्णय चौके-छक्के की संख्या से दे।
   
                    मेरे अनुसार सर्वमान्य निर्णय यही होता,कि दोनों देशों को सह विजेता घोषित किया जाता।
          
                                                     :- कृपेंद्र तिवारी
                               ।। जय हिन्द ।।

Tuesday, December 10, 2019

नागरिकता संशोधन बिल,2019: विपक्ष का बखेड़ा

तत्कालीन भारत सरकार द्वारा भारत में रह रहे शरणार्थियों के लिए नागरिकता अधिनियम,1955 में संशोधन कर नागरिकता संशोधन विधेयक,2019 को लोकसभा में दूसरी बार पेश किया गया है। जिसे संक्षिप्त रूप से CAB 2019 भी कहा जाता है।
                       ज्ञात हो कि यह विधेयक पिछली बार 2016 में भी लोकसभा में प्रस्तुत हुई और एक गहमागहमी चर्चा के साथ पास भी हुई,लेकिन सत्ता पक्ष के पास राज्यसभा में बहुमत ना होने के कारण विधेयक लंबित हुए और अंततः लोकसभा के भंग(विघटन) होने से यह विधेयक समाप्त हो गई।

•क्या है,नागरिकता संशोधन विधेयक 2019?

 यह विधेयक भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे पड़ोसी देशों (पाकिस्तान,अफगानिस्तान,बांग्लादेश) के नागरिको का भारत की नागरिकता ग्रहण से संबंधित है। इस विधेयक में प्रावधान है, कि पड़ोसी देशों में रह रहे प्रताड़ित अल्पसंख्यक समुदाय जैसे:- हिन्दू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध को भारत में शरणार्थी के रूप में बसा के उन्हें नागरिकता प्रदान करना। सामान्यतः पूर्व में नागरिकता ग्रहण हेतु उन्हें 11 वर्षों तक भारत में रहना अनिवार्य था,जो इस संशोधन के उसकी अवधि घटाकर 6 वर्ष के दी गई है। मौजूदा कानून के अनुसार भारत में अवैध रूप से दाखिल होने वाले व्यक्तियों को अपराध की सूची में रखा जाएगा जिससे उन्हें या तो उनके देश भेज दिया जाएगा अथवा भारत सरकार द्वारा हिरासत में रखा जाएगा।

•क्या CAB,2019 भारतीय नागरिकों की नागरिकता को प्रभावित करता है?

आपको स्पष्ट होना चाहिए, कि यह विधेयक भारतीय नागरिक के नागरिकता को ना प्रभावित कर,भारत में शरणार्थी के रूप में नागरिकता ग्रहण किए जाने वाले व्यक्तियों के मामले को प्रभावित करता है। 

•क्या CAB,2019 भारतीय संविधान अनुच्छेद -14 का उल्लघंन करता है?

भारतीय संविधान की आत्मा तथा "मैग्नाकार्टा" कहीं जाने वाली उसकी भाग -3 "मौलिक अधिकार" हमें विविध प्रकार के अधिकार प्रदान करते है। जिसमें समानता के अधिकार के तहत अनु.-14,हमें विधि के समक्ष समानता एवं विधि का समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है।जिसमें उल्लेखित है, कि राज्य के द्वारा ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं किया जाएगा,जो जनमानस में विभेदता को उत्पन्न करे।
              लेकिन वर्तमान विधेयक CAB,2019 इसका विरोध नहीं करती है,क्योंकि अनु.14 में राज्य को निर्देश है, कि राज्य भारतीय संप्रभुता,अखंडता अथवा न्याय(सामाजिक,शैक्षणिक आदि) को ध्यान रखते हुए विशेष उपबंध कर सकती है। जैसे:- निरपेक्ष स्थिति में तो आरक्षण का विषय भी समानता के अधिकार का उल्लघंन है और अनु.30 भी अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार प्रदान करता है,जो अनु.14 के मूल भावना का निरपेक्ष रूप से विरोध करता है।  लेकिन संविधान में हमारे द्वारा पढ़े गए अनुच्छेदों में केवल एक पंक्ति मात्र होती है,जिसे हम अपने चित्त में रखकर दुहाई देना प्रारंभ करते है,जो वास्तविकता में पंक्ति मात्रा ना होकर इतनी वृहत होती है, कि प्रत्येक अनुच्छेद में एक किताब लिखी जा सकती है।
               अंततः मै यही कहना चाहूंगा,कि यह बिल अनु.14 का विरोध उसी प्रकार नहीं करती जिस प्रकार आरक्षण।

•तो क्या कारण है, कि इसमें पड़ोसी देशों के मुसलमानों को स्थान नहीं दिया गया है?
 लोकसभा में विधेयक पेश करने के पश्चात गृहमंत्री अमित शाह जी के द्वार पक्ष रखने पर हुए कांग्रेस द्वारा इसे धार्मिक आधार पर बनाया हुए विधेयक का मुद्दा उठाने पर शाह द्वारा आवेश में दो टूक जवाब दिया गया, कि "यदि आप सन 1947 में देश का धरना के आधार पर विभाजन नहीं करते तो आज हमे इस विधेयक को लाने आवश्यकता नहीं पड़ती।"
               इस प्रश्न का कारण चिन्हांकित देशों में मुस्लिम समुदाय का बहुसंख्यक होना है,जिससे अल्पसंख्यक उत्पीड़ित होकर पलायन को मजबूर हो जाते है तथा शरणार्थी के रूप में भारत में शरण ग्रहण करते है।
               भारत प्राचीनकाल से "वसुधैव कुटुंबकम्" के आदर्श का परिपालन करते हुए उसे आत्मसात करने को सदैव अग्रसर रहा है।जो शरणार्थियों प्र हमारी सहानुभूतिक स्वभावो का उदाहरण है।
               इसे एक उदाहरणों के द्वारा समझ जा सकता है, कि यदि विषय किसी दुष्कर्म मामला में सहायता करने की हो तो आप पीड़िता की सहाइटा कर उसे आश्रय देंगे या उस गुनहगार को जो उन्हें उत्पीड़ित किया हो। इका ताजा उदाहरण तिब्बती शरणार्थियों का है, कि चीन के द्वारा उत्पीड़नों बौधविलंबियो भारत में शरण लेना है। 
              तो प्रश्न उठता है,की क्या चीनियों को भी नागरिकता दे? तो इसका उत्तर कभी नहीं होगा।
              यही कारण है, कि मुसलमानों को इस विधेयक में स्थान नहीं दिया गया है।।

Monday, December 9, 2019

हैदराबाद गैंगरेप:पुलिसिया एनकाउंटर

जैसा की आप सभी को ज्ञात है,कि हैदराबाद में बीते कुछ दिनों पहले की रात में वहां की एक महिला पशु चिकित्सक का कुछ युवकों द्वारा रात्रिकाल में सहायता देने के बहाने उसका दुष्कर्म किया गया एवं उनकी हत्या कर उनके शव को NH-44 में एक नाले के नीचे जला दिया गया। घटना की निर्ममता को देखते हुए पूरा देश आक्रोशित हो उठा और सर्वत्र लोगो द्वारा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष(सामाजिक माध्यम/social sites) रूप से पीड़िता दिशा के समर्थन में आरोपियों को पकड़े जाने के बाद उनकी सख्त न्यायिक प्रक्रिया तहत शीघ्रातिशीघ्र फांसी की मांग की जाने लगी।।

पकड़े गए चारो आरोपी तेलंगाना पुलिस के हिरासत में थे,तेलंगाना पुलिस 6 दिसंबर प्रातःकाल आरोपियों के अपराध किए जाने की तरीका समझने हेतु(रीक्रिएट सीन) घटना स्थल पर ले गई। उसके बाद की खबर सभी को चौंका देने वाली तथा देश के माहौल को उत्साहित कर देने वाली रही,चारो आरोपियों को पुलिस के द्वारा उनके ही पिस्टल को लूटकर भागने और गोलीबारी के आरोप में स्वयं के बचाव हेतु एनकाउंटर किए जाने की बात कहा गया।।

अब प्रश्न यह उठता है, कि

•क्या यह एनकाउंटर सही है या नहीं?

इस संबंध में तेलंगाना सरकार ने पुलिस आयुक्त महेश एम भागवत की अध्यक्षता में एक SIT गठित की है,जो इसकी सत्यता की पुष्टि करेगी।।

•क्या लोगो के द्वारा इस घटना को न्याय के रूप में पेश किया जाना सही है?

भारतीय संविधान और कानून को बने हुए लगभग 70 वर्ष हो गए है,और यही जनमानस जो पिछले 70 वर्षों से इस कानून का परिपालन करते रहे है। वो ही आज कानून से हटकर हुए इस एनकाउंटर रूपी न्याय को "श्रेष्ठ न्याय" की संज्ञा से विभूषित कर रहे है।
                             इसका मुख्य कारण है,हमारी न्यायिक प्रक्रिया में विलंबता का होना,जिसका जिक्र स्वयं वर्तमान CJI श्री एस ए बोबडे जी ने जोधपुर उच्च न्यायालय के नवनिर्मित भवन के लोकार्पण समारोह में किया। और जनमानस की सब्र रूपी बांध इन 70 वर्षों में पूर्णतः लबालब होकर टूटने लगा है,यदि समय रहते इस पर सुधार हेतु समीक्षा ना किया जाए और न्यायिक प्रक्रिया को तीव्रता से संचालित ना किया जाए तो जनता का विधिक न्याय से विश्वास पूर्णतः खत्म हो जाएगा।।

•तो क्या लोगो के द्वारा सजा अथवा चौराहों पर फांसी(तात्कालिक न्याय) उचित है?

शासन चाहे राजतांत्रिक हो या लोकतांत्रिक, उसके सफल संचलन हेतु विधि की आवश्यकता होती है। तो निश्चित ही इस विषय पर मेरा व्यक्तिगत राय यही है,कि उन चारो आरोपियों को सजा यदि न्यायिक प्रक्रिया से मिलता तो यह स्वागत योग्य फैसला रहता। जनता के हाथों में न्याय आने से आंतरिक व्यवस्था चरमरा जाएगी। जनता इससे और अधिक प्रताड़ित तथा स्वयं हिंसकता की ओर अग्रेषित होंगे। 
                  निरपेक्षतः लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही न्याय जनमानस के हित में होगा।।

Sunday, September 15, 2019

हिंदी दिवस पर चिंतन

।।मेरे विचारों का यह लेख अवश्य पढ़ें।।

सोशल साइट्स(सामाजिक अंतरजाल) पर लोगों के स्टेटस(स्थिति)  देख कर मन व्यथित एवं चिंतित हो उठा,कि हमारे देश में भी हिंदी भाषा का दिवस मनाया जाता है।

हमारे मन-मस्तिष्क में यह तथ्य पूर्व से विद्यमान है,कि कोई भी दिवस किसी संज्ञा विशेष के स्मरण अथवा उसके संरक्षण हेतु मनाया जाता है।

किसी भी देश का अस्तित्व उसकी संस्कृति में विद्यमान होती है।

इस संस्कृति के मुख्य अंग में से एक उसकी भाषा है।

हमारी संस्कृति हिंदुत्व(सनातन) तथा उसकी भाषा हिंदी है।

किसी विचारक,दार्शनिक ने कहा है,कि किसी देश के अस्तित्व का जड़ से अंत करना हो तो उसकी संस्कृति पर कुठाराघात किया जाए।

जो कि हमारे भारतीय इतिहास में मध्यकाल में मुस्लिम शासकों तथा आधुनिक काल में ब्रिटिश शासन के द्वारा किया गया।

इसी का परिणाम है,कि जो देश कभी विश्व गुरु हुआ करती थी और "वसुधैव कुटुंबकम्" अर्थात विश्व बंधुत्व के आदर्श को हृदय में संजो कर रखती थी आज वही देश आपस में सामाजिक रूप में संघर्षरत हैं।

अपनी मातृभाषा केवल ध्वनि के विनिमय का माध्यम ही नहीं बल्कि भाव,विचार,संवेदना के विनिमय का भी माध्यम होती है।

हमारे देश में राजनीतिज्ञों ने अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए देश हित को भी दांव पर लगा दिए, हमारे संविधान में वर्णित था,कि संविधान के लागू होने के 15 वर्ष पश्चात समस्त कार्यवाही चाहे वह उच्च न्यायालय,उच्चतम न्यायालय,संसद,विधानमंडल,स्थानीय निकाय,सरकारी,सहकारी एवं निजी निगमों में स्वतंत्रता से पूर्व चली आ रही भाषा के आधार पर कार्यवाही होगी तत्पश्चात हिंदी भाषा के माध्यम से कार्य संचालित होगी।

दुर्भाग्यवश हमारे तत्कालीन सत्ताधीश सरकार ने अंग्रेजी भाषा को "राजभाषा अधिनियम 1963" के तहत अनिश्चितकाल तक के लिए लागू कर दिया है।

एक मामला स्मरण में आता है,कि 1971 में एक याचिकाकर्ता द्वारा हिंदी में बहस के लिए "बंदी प्रत्यक्षीकरण' याचिका उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत किया गया परंतु न्यायालय ने इस याचिका को केवल इस आधार पर निरस्त कर दिया,कि वह अंग्रेजी में नहीं है अर्थात हिंदी का प्रयोग असंवैधानिक है।

जिस प्रकार आज के जनसाधारण को संस्कृत भाषा अति क्लिष्ट एवं व्यापक महसूस होती है तथा जिसे देवभाषा की संज्ञा दी जाती है अर्थात देवो के द्वारा बोली जाने वाली भाषा माना जाता है,वह कभी जनमानस की भाषा हुआ करती थी।

इसी प्रकार आज हिंदी भाषा के प्रति हम जागरुक न हुए और इसका संरक्षण कर उसे आत्मसात ना करें तो आने वाली पीढ़ियों को भी हिंदी देव भाषा अर्थात जन सामान्य की भाषा होने पर विश्वास नहीं होगा कि आमजन भी हिंदी भाषा में वार्तालाप करते थे।

                                                    

                                                          :-कृपेन्द्र तिवारी

" VIP दर्शन व्यवस्था "

मंदिर की परिकल्पना ऐसे स्थल के रूप में सर्वविदित है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति,जो उस पद्धति पर विश्वास रखता है, निर्बाध रूप से अपनी उपासना कर सक...