Thursday, October 6, 2022

माँ दुर्गा विसर्जन, पंडरिया

#माँ_दुर्गा_विसर्जन

 
पंडरिया नगर में दशहरा पश्चात गत वर्ष की भाँति माँ दुर्गा जी का विसर्जन होना था......लेकिन विसर्जन कार्यक्रम में हमारे ही जनमानस के द्वारा कुछ फूहड़ता,माँ की उपस्थिति को अपमानित करने वाली गीत-संगीत का चलाना........ जनमानस की आस्था को आहत करती थी।

इसी क्रम में नवरात्र पर्व प्रारम्भ होने के पूर्व नगर के गणमान्यजन विशेषत: व्यापारी संघ पंडरिया एवं पुलिस प्रशासन के साझा सहयोग एक नवाचारी पहल किया गया......यह पहल था,कि
1) माँ के विसर्जन को एक विशेष विषय पर आधारित थीम के अनुसार विसर्जन हेतु निकलना।
2) एक निश्चित समयांतराल में सभी की उपस्थिति।
3) समिति को प्रदाय झाँकी क्रमांक के अनुरूप अपनी झाँकी प्रस्तुत करते हुए आगे बढ़ना।
4)इस कार्यक्रम में किसी भी प्रकार की अश्लीलता,फूहड़ता को शामिल नही करना,जिससे जनभावना आहत होती हो।

यह नवाचार वर्तमान में अपनी प्रासंगिकता में लगभग पूर्णता को प्राप्त करने की ओर अग्रसर रहा.......इससे आने वाले समय मे नगर को सांस्कृतिक रूप से अनेक लाभ होंगे....
1) समितियों में सकारात्मक प्रतिस्पर्धा विकसित होंगी।
2) इससे नगर के समिति एवं मंडल में रचनात्मकता का विकास होगा।
3) जाने अनजाने होने वाले माता के अपमान पर अंकुश लगेगा।
4) आने वाले वर्षों में पंडरिया नगर का नाम ख्यातिलब्ध होगा....साथ ही ऐसे प्रदर्शनों से समीपस्थ ग्रामीण बन्धुओ,माता-बहनों के द्वारा झाँकी दर्शन हेतु आगमन होगा।

जो निश्चित ही पंडरिया में पूर्व के राजकालीन परिदृश्य में दशहरा में जो परिवेश रहता था,उसे पुनः प्राप्त करने में सहायक होगा.....और एक उत्कृष्ट परमपरा विकसित होंगी........

ऐसी सोच के साथ आपका.......😊❤️🙏

Monday, October 3, 2022

नवरात्र आयोजन:- गरबा

सनातन धर्म बह्यन्तर कारको से अधिक अभ्यंतर कारको से विकृतता की ओर अग्रसर है..........

"गरबा" के नाम पर जो आयोजन किये जा रहे है,उसमे मुख्य विषय अर्थात केंद्रबिंदु,दैवीय आराधना का होने के अतिरिक्त(बजाय).....सारे वो साधन उपलब्ध है,जो मनोरंजन एवं अन्य मानवीय स्वार्थिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु आवश्यक है। इस तारतम्य में अनेक मंडल एवम समिति माता की आराधना एवं भक्ति जैसे तथाकथित पोस्टर छपवा कर ऐसे सेलेब्रिटी(नायिका) को मुख्य आथित्य अथवा नृत्य/गायन प्रदर्शन हेतु आमंत्रित करते है........जिन्हें माता से दूर दूर तक कोई सरोकार नही और वह मनमाने ढंग से नृत्य/गायन,जो लोगो के बीच एक मनोरंजन(@$#%) माहौल पैदा कर दे,प्रस्तुत करती है। इस पूरे क्रम उनका कोई दोष नही,क्योकि वो तो अपने कार्यक्षेत्र के अनुरूप कार्य कर रहे है। उनका तो कार्य ही है,रंगमंच पर ऐसे रस से युक्त कार्यक्रम की प्रस्तुति करना,जिस हेतु वह लब्धप्रतिष्ठ है।

इसमें मुख्य रूप जवाबदेह तो हम और हमारा ये समाज है,जो अपने ही आराध्य(माँ दुर्गा) को आधार मानते हुए कुछ तुच्छ रसास्वादन हेतु ऐसे कार्यक्रम आयोजित कर रहे है अथवा उसमे शामिल हो रहे है।

गरबा जैसे सांस्कृतिक नृत्य के आत्मीकरण,स्वीकार्यता एवं  प्रसार का किंचित भी विरोध नही.......अपितु उनके मूलभूत तत्व(उद्देश्य/आराधना) को अल्पीकृत करना स्वीकार नही..........

और यदि जनमानस के क्षेत्रीय गर्व की भावना को केंद्रित करते हुए बात कही जाए तो हमे प्राथमिकता "सुवा नृत्य","जसगीत" एवं "कर्मा नृत्य" को देना चाहिए,जिससे हममे स्वयं की क्षेत्रीय संस्कृति के प्रति गर्व का भाव जागृत होगा...........और संस्कृति संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य भी पूर्ण होंगे.........

और यह स्थिति फिर वर्तमान में कही जा रही तथाकथित गर्वयुक्त ध्येयवाक्य "छत्तीसगढ़िया,सबले बढ़िया" को प्रासंगिकता के पैमाने पर अस्तित्वमय करेंगी और जो अपनी यथार्थता को प्राप्त करेगी.......🤔🤔🤔

Sunday, October 2, 2022

साक्षात्कार:-29 सितम्बर,2022

🛑डॉ. मोतीलाल बाचकर सर बोर्ड 

⭕बाचकर सर:-1)मूलतः कहा के है?
2)आपने गणित(PCM) में बी.एस सी. किया है।
3)आप कौन सा पद प्राप्त करना चाहते है?
4)आप प्रशासन में क्यो आना चाहते है?
5)सारे पदों में DC को ही प्राथमिकता क्यो?
6)DC बनने पर क्या कार्य करेंगे?
7)वनांचल क्षेत्र के विकास में आपका योगदान।
8)आर्थिक स्थिरता तो अन्य पदों में भी?
9)गणित(PCM) में बी.एस सी. के पश्चात एम.ए.(इतिहास) क्यो? 
10)संपरिक्षक के क्या कार्य होता है?
11)अनुदान प्राप्त निकाय क्या है? उनका नाम बताइये।

⭕साव सर:-1)गणित का प्रशासन में क्या उपयोग है?
2)एक पेपर में कुछ चित्र(त्रिभुज,चतुर्भुज) बनाकर उसका क्षेत्रफल लिखकर समझाइये।
3)कवर्धा में मिट्टी कौन सी पाई जाती है?
4)मिट्टी का स्थानीय नाम।
5)कवर्धा की मुख्य फसल।
6)गन्ने का ही उत्पादन क्यो?
7)कवर्धा के वृष्टि छाया क्षेत्र होने के क्या कारण है?
8)मैकल पर्वत श्रेणी का मानसून पर प्रभाव।
9)छत्तीसगढ़ में औसत वार्षिक वर्षा।
10)स्थल पवन और जल पवन क्या है?
11)दोनों के चलने का समय और मानसून पर प्रभाव
12)दक्षिण पश्चिम मानसून का भारत मे प्रवेश और लौटती हुई मानसून को चित्रवत समझाइये।
13)वाष्पीकरण और संघनन क्या है?
14)बादल निर्माण की प्रक्रिया समझाइये।
15)अम्ल वर्षा क्या है?
16)डोंगरगढ़ से बिलासपुर के मध्य नदी का वर्णन 

⭕सदस्य:-1)लंपी वाइरस क्या है? सरकार के प्रयास।
2)राज्य शासन की फ्लैगशिप योजनाएं
3)राजीव गांधी किसान न्याय योजना की प्रासंगिकता।
4)क्रयशक्ति क्षमता क्या है?
5)आपदा प्रबंधन क्या है?
6)परिस्थिति आधारित प्रश्न:-किसी क्षेत्र में रात्रि काल मे बाढ़ की स्थिति होने पर आपका क्या प्रतिक्रिया एवं निर्णय होंगे? 

⭕सदस्य:-1)यूरोप महाद्वीप को पूर्व,मध्य और पश्चिमी क्षेत्र में विभाजित कीजिये।
2)रूस मुख्यतः किसी महाद्वीप में शामिल है?
3)अफ्रीका महाद्वीप के 5 देश एवं उनकी राजधानी
4)दक्षिणी अमेरिका के 5 देश व उनकी राजधानी
5)अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष का मुख्यालय एवं उनके कार्य
6)IMF का ब्रिटेन की वित्तीय संकट में भूमिका।
7)NATO क्या है,उसका पूरा नाम एवं सदस्य संख्या
8)रूस-यूक्रेन संकट में नाटो(NATO) की भूमिका।

Wednesday, September 14, 2022

कार्यालयीन प्रशिक्षण अनुभव

              ★फीडबैक★

विषय:-कार्यालय,क्षेत्रीय उपसंचालक,छत्तीसगढ़ राज्य संपरीक्षा,दुर्ग की ओर से विभाग एवं कार्यालय के क्रियाकलाप संबंधी जानकारी हेतु दिनांक 07/09/22 से 09/09/22 तक त्रिदिवसीय प्रशिक्षण सत्र पर प्रतिविचार बाबत।

•प्रथम दिवस:-दिनाँक 07/09/22 को ज्येष्ठ संपरिक्षक मैम श्रीमती सरला साहू एवं सुश्री मिथिलेश्वरी शर्मा जी के द्वारा प्रातः 11 बजे से छत्तीसगढ़ राज्य संपरीक्षा प्रक्रिया एवं स्थानीय निकाय के संबंध में प्राथमिक परिचय दिया गया। जिससे हमें अपने कार्यालय के द्वारा किये जा रहे अंकेक्षण कार्य हेतु निकाय संबंधी जानकारी प्राप्त हुए। सबसे महत्वपूर्ण यह रहा,कि हमे हमारे विभाग का पूर्व नाम "स्थानीय निधि संपरीक्षा" का नामनुरूप जानकारी एवं वर्तमान नाम रखने संबंधी प्रासंगिकता समझ मे आयी।
             द्वितीय सत्र श्रीमती गुपेश्वरी मैडम जी का रहा,यह सत्र मेरे लिए अति महत्वपूर्ण रहा,क्योकि इस कार्यालय संबंधी वास्तविकता एवं यथार्थ से परिचय मैंम से प्रात्यक्षिकता के फलस्वरूप ही प्राप्त हुआ। जिस तारतम्य में अंकेक्षित निकाय में किये अंकेक्षण कार्य के फलस्वरूप हमारे द्वारा अपनायी जाने वाली प्रतिवेदन की प्रक्रिया को बड़े ही सहज एवं सरल भाषा शैली में व्यक्तिगत अनुभव के माध्यम से समझाया गया। प्रतिवेदनों का निकाय से संचालनालय तक पहुचने की स्तरबद्ध जानकारी उल्लेखनीय रही। तथा प्रतिवेदनों का विधान सभा पटल मे रखने की प्रक्रिया समझाकर एवं वार्षिक प्रतिवेदन को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया गया।


•द्वितीय दिवस:-दिनाँक 08/09/22 का प्रथम सत्र श्रीमती अरुणा पवार जी तथा एवं श्री दीनबंधु चतुर्वेदी सर का रहा,लेकिन किसी कारणवश श्री चतुर्वेदी सर की अनुपस्थिति में उस सत्र का संचालन श्री होमन कुमार ठाकुर सर के द्वारा किया गया,जिसमें "ऑडिट ऑनलाइन" विषय पर कंप्यूटर के माध्यम से प्रत्यक्ष प्रशिक्षण दिया गया,विषय का नया स्वरूप एवं तकनीक आधरित होने के कारण उक्त विषय पूर्णरूपेण समझ नही आया लेकिन विषय के प्रति समझ पैदा हुई।
         आगे अरुणा मैम के द्वारा संपरीक्षा अधिनियम,1973 का वाचन करते हुए,उसके सैद्धान्तिक स्वरूप से अवगत कराया गया।
                  
              द्वितीय सत्र श्री अतुल कुमार अग्रवाल एवं श्रीमती रामेश्वरी मैम के द्वारा लिया गया। अग्रवाल सर का द्विदिशीय वार्तालाप एवं प्रश्नोत्तर शैली,विषय के समझ हेतु मन को सहज ही आकर्षित करता है और साथ ही रामेश्वरी मैम का समझाने के प्रति उत्सुखता।
             श्री अग्रवाल सर के द्वारा हमारे अब तक के कार्यालयीन समझ का आंकलन कर गबन,अंकेक्षण शुल्क एवं मासिक माहिती की जानकारियां प्रदान किया गया।जिसमें रामेश्वरी मैम के द्वारा भी निकायों के उक्त विषय संबंधी परिचय कराया गया।

•तृतीय दिवस:-दिनाँक 09/09/22 को श्री दिनेश कुमार सर के द्वारा बजट,स्थापना,वेतन निर्धारण एवं अधिभार संबंधी समस्त जानकारी सह अधिनियम प्रदान किया गया। श्री सर जी का प्रशिक्षण सत्र के साथ उनकी उपस्थिति इस कार्यालय में एक अभिभावक की भूमिका को पूरा करता है। सर के द्वारा प्रदत्त वेतन निर्धारण एवं अवकाश संबंधी जानकारी अत्यधिक आकर्षित करने वाला था।
                 

Sunday, October 17, 2021

"75 दिनों का विश्वप्रसिद्ध दशहरा"

भारतीय परिक्षेत्र में दण्डकारण्य भूमि,जिसे आज हम सभी बस्तर के नाम से जानते हैं,प्रभु श्री राम जी के द्वारा सर्वाधिक समय व्यतीत किये गए स्थल के रूप में लब्धप्रतिष्ठित है। वर्तमान का बस्तर निश्चित ही देश में अपनी नक्सल गतिविधियों के कारण चर्चित रहता है,लेकिन हम बस्तर भूमि की समृद्ध जनजातीय एवं साझा सांस्कृतिक विरासत को नजरअंदाज नहीं कर सकते। जनजातीय संस्कृति में मुख्य रूप से विश्वप्रतिष्ठित बस्तर के दशहरा का स्थान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। चूँकि यह भारतीय परिवेश में मनाए जाने वाले दशहरा पर्व से पूर्णतः भिन्न होती है। जिसमें रामायण महाकाव्य के अनुसार,न तो रावण का दहन होता है और न ही प्रभु श्रीराम जी के विजय का उत्सव,बल्कि यह आश्विन मास शुक्लपक्ष दशमी को माँ दुर्गा जी के द्वारा सामान्य जनमानस के रक्षार्थ हेतु किए गए अत्याचारी महिषासुर के शिरोच्छेदन से संबंधित है। बस्तर में दुर्गा माता के रूप में माँ दंतेश्वरी की पूजा की जाती है। बस्तर का दशहरा,सामान्यतः मनाये जाने वाले एक दिन के दशहरे की अपेक्षा 75 दिनों तक चलने वाला पर्व है,जिसमें मनाया जाने वाला रस्म मुख्यत: अनवरत रूप से तेरह दिनों तक चलता है। 


इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बस्तर में आरुढ़ "काकतीय वंश" से जुड़ी हुई है। बस्तर रियासत के राजा "पुरुषोत्तम देव" के द्वारा पैदल मार्ग से चलकर जगन्नाथ पुरी की यात्रा की गई। यहां पुजारी ने राजा पुरषोत्तम देव के समर्पण भाव से प्रसन्न होकर उन्हें "रथपति" की उपाधि से विभूषित किया। जब पुरुषोत्तम देव का वापस बस्तर आगमन हुआ तो धूमधाम से बस्तर का दशहरा उत्सव मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई,तभी से "गोंचा" अर्थात दशहरा में रथचालन की परंपरा प्रारंभ हुई। 

छत्तीसगढ़ के अंचल में मनाए जाने वाले प्रकृति पूजन का पर्व "हरेली",जिसे श्रावण माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है,से 75 दिनों तक चलने वाली इस पर्व की शुरुआत "पाट जात्रा" कार्यक्रम से होता है। आमावस्या को माचकोट जंगल(बस्तर) से लाई गई सात लकड़ियों के गोला की पूजा की जाती है,तत्पश्चात सात "मांगुर मछलियों" की बलि चढ़ाई जाती हैं तथा लाई-चना अर्पित किया जाता है। इस लकड़ी से काष्ठकार्य में प्रयुक्त होने वाले औजार के बेंठ(हत्था) बनाकर रथनिर्माण की प्रक्रिया को प्रारंभ किया जाता है। रथ निर्माण का कार्य स्थानीय स्तर पर विशिष्ट ग्राम एवं समुदाय विशेष के व्यक्तियों द्वारा संपन्न किया जाता है। इस कार्य में श्रावण,भाद्रपद और आश्विन माह का प्रथम पक्ष(कृष्णपक्ष) व्यतीत हो जाता है। 


आश्विन शुक्ल पक्ष के प्रथम तिथि प्रतिपदा,जिससे नवरात्र प्रारंभ होता है,से प्रथम रस्म "काछिनगादी" प्रारंभ होती है,जिसमें एक विशिष्ट समुदाय "महरा" की कन्या को "काछिनदेवी" बनाकर गद्दी पर बैठाया जाता है,जो गद्दी विशेषत: बेल(बबूल) के कांटो से बनी होती है। आगे इस पर्व के सफलतापूर्वक संचालन एवं इसके निर्विघ्न समापन हेतु "हलबा" जनजाति के एक सदस्य को जोगी बनाकर,उसे 9 दिन का व्रत रखवाकर योग साधना में बैठाया जाता है,जिनके साधना का परिणाम दशहरा पर्व का निष्कंटक पूर्ण होना है। 

माता सती के दाँत के गिरने के कारण शक्तिपीठ के रूप में ख्याति प्राप्त "माँ दंतेश्वरी देवी" बस्तर की कुलदेवी है,जो इनकी आराधना का केंद्र बिंदु है। रथयात्रा में माँ दंतेश्वरी के छत्र को रथारूढ़ कर नगर भ्रमण कराया जाता है जिसके चारों ओर "गौर लोकनृत्य" करते हुए जनजाति समाज आनंदचित्त रहते हैं,इस गौर नृत्य को प्रसिद्ध मानवशास्त्री "वेरियर एल्विन" ने संसार का सबसे "सुंदरतम नृत्य" कहा है। इस प्रकार नौ दिन के नवरात्र पर्व के सफलतापूर्वक समापन पर "जोगी उठाई" कार्यक्रम किया जाता है,जिसमें नौ दिन पूर्व बैठे जोगी को विशेष भेंट अर्पण कर योग साधना से उठाया जाता है और जोगी उठाने के पश्चात दंतेवाड़ा में स्थित इष्ट देवी "मावली माता" को पालकी में बिठाकर बस्तर लाया जाता है जिसे चार माड़िया जाति के व्यक्तियों द्वारा कंधे से उठा कर लाया जाता है। 

आगे नवरात्र का समापन होता है तथा विजया दशमी तिथि को "भीतररैनी" अर्थात रथ को नगर के भीतर भ्रमण कराया जाता है और रथ को परिक्रमोपरांत प्रथा के अनुसार एक विशेष ग्राम "कुम्हड़ाकोट" ले जाते हैं,जहां सभी नागरिकों को रूमाल व बीड़ा(पान) देकर सम्मानित किया जाता है। विजयादशमी के पश्चात आश्विन शुक्ल एकादशी को ग्राम के राजा के द्वारा नवोदित अन्न को प्रसाद के रूप में माँ को समर्पित किया जाता है। 

पूरे पर्व का समापन समस्त समाज में समन्वय को स्थापित करने वाले बैठक के रूप में "मुड़िया दरबार" आयोजित किया जाता है,जिसका आयोजन बस्तर अंचल के राजा के द्वारा किया जाता है। जिसमें ग्राम वासियों की सामान्य समस्याओं पर चर्चा कर उसका निराकरण किया जाता है।इस प्रकार इस आयोजन के अंत में दंतेवाड़ा से लाई गई "मावली माता" को पुनः विदाई सम्मान देते हुए दंतेवाड़ा ले जाया जाता है जिसे स्थानीय स्तर पर "ओहाड़ी रस्म" कहते हैं। इस प्रकार विश्वप्रसिद्ध बस्तर के दशहरा उत्सव सम्पन्न होता है।

Thursday, May 27, 2021

ब्राह्मणजनों का दायित्व

आज के समाज को विद्वत पंडितो की आवश्यकता है,क्योकि बिना किसी तर्क के चली आ रही परंपरा आज के बुद्धजीवी वर्ग को रूढ़िवादी अथवा अंधविश्वास प्रतीत होती है........इस प्रकार,ऐसे ज्ञानवर्धन से सांकेतिक और प्रेरणादायी परंपरा मे रूढ़िवादी रूपी धूल,जो परत के रूप में जमी हुई है,जिससे यह उपयोगिताविहीन अथवा व्यर्थ लगती है,उस धूल के निवारण और स्वच्छिकरण हेतु आवश्यकता है............


क्योकि आज जनमानस का संस्कृत के प्रति विलगाव हो गया है,कारण भी सही है,कि संस्कृत के ज्ञान से हमे प्राप्त क्या होगा....???

तो संस्कृत के इस विमुखीकरण के दौर में संस्कृत की समझ किसे.......परंपरा की समझ किसे....??

तो ऐसे पंडितो/ब्राह्मणजनों की अनिवार्य आवश्यकता है,जो समाज को शास्त्ररूपेण मार्गदर्शित कर हमारे मन मस्तिष्क में बैठे समस्त शंशयो का निराकरण करे,जिससे हममे ऐसे अनमोल विरासत के प्रति लगाव तथा गर्व के भाव पैदा हो.........

प्राचीन समय में समाज का मार्गदर्शन ही ब्राह्मणों का कार्य हुआ करता था........जो आज के ब्राह्मणों में पण्डित्यता के अभाव में ऐसी बाते कही ओझल सी हो गई है,यही कारण है ब्राह्मण तात्कालिक समय में हास्य के पात्र तथा उनके द्वारा कराई जाने वाली कर्मकाण्ड आडंबर प्रतीत होता है............


इस निमित्त संस्कृति संरक्षण का समस्त कार्यभार केवल ब्राह्मण(जिनमे पांडित्य के गुण हो) के ऊपर ही टिकी हुई है.......👍👍

:-कृपेन्द्र तिवारी

Friday, January 8, 2021

अमेरिकी संसद में हिंसा

देश की सत्ता कैसे चले,ये हमको क्यो सिखलाते तुम।
लोकतंत्र के सही मायने,ये हमको क्यो बतलाते तुम।।

स्वयं के संसद में देखो,कि कैसे हिंसा प्रस्फुटित हुए।
स्वार्थसत्ता के भावों से,जनमत से क्यो तुम रुष्ट हुए।।

देशवासियो के निर्णय और जनमत का सम्मान करो।
सहर्ष गर्व के भावों से तुम सत्तापद से विश्राम करो।।

:-कृपेन्द्र तिवारी......







" VIP दर्शन व्यवस्था "

मंदिर की परिकल्पना ऐसे स्थल के रूप में सर्वविदित है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति,जो उस पद्धति पर विश्वास रखता है, निर्बाध रूप से अपनी उपासना कर सक...