Tuesday, April 4, 2023

" VIP दर्शन व्यवस्था "

मंदिर की परिकल्पना ऐसे स्थल के रूप में सर्वविदित है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति,जो उस पद्धति पर विश्वास रखता है, निर्बाध रूप से अपनी उपासना कर सके। मंदिर प्रायः सार्वजनिक स्थल ही होते है। मंदिर परिसर आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने तथा धार्मिक आचरण को निर्वहन करने का केंद्र है। मंदिर परिसर में भगवान के समक्ष सभी समान है। संवैधानिक रूप से भी हम समान है।

उपर्युक्त छायाचित्र, एक महिला के द्वारा मंदिर परिसर में तथाकथित भेदभाव(दर्शन संबंधी) का विरोध करते हुए गर्भगृह में जाकर शिव जी पर जल चढ़ाने,उनकी पूजा-अर्चना  का है। सामान्य दृष्टि से उन्होंने स्थापित व्यवस्था का विरोध किया और जबरिया पूजा-अर्चना किया लेकिन उन्होंने इस मध्यम से जिस विषय पर लोगो का ध्यान आकृष्ट किया वह अत्यंत महत्वपूर्ण है, कि
"क्या मंदिर जैसे धार्मिक स्थल पर आर्थिक आधार(VIP व्यवस्था) पर भेदभाव जायज है...?"


जो सर्वथा अनुचित है। 
प्रथमतः, तो ये आर्थिक सक्षमता के आधार पर विभेदीकरण की बात हुई। 
द्वितीय, आर्थिकता इतनी महत्वपूर्ण है, कि किसी को उनके आराध्य के पूजन से वंचित किया जा सकता है?
तृतीय और सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात, कि मंदिर परिसर कोई व्यवसायिक संस्थान नही है। लोगो की आस्था का केंद्रबिंदु है।

निश्चित ही किसी बड़े धार्मिक केंद्रों,मंदिर परिसरों में ट्रस्ट का कार्य व्यवस्था निर्धारण तथा समुचित प्रबंधन का होता है लेकिन ऐसी विभेदकारी नीति का निर्धारण न्यायसम्मत तथा व्यवहारसम्मत नही है।

मेरे अपने विचार इस VIP व्यवस्था के विरुद्ध है..........आपके विचारो की अपेक्षा में.


Sunday, January 8, 2023

शुभम मैम जन्मदिवस

मेरे जीवन का प्रथम शासकीय नियोजन हुआ,जिसका स्थान रहा छत्तीसगढ़ राज्य संपरीक्षा,क्षेत्रीय कार्यालय,दुर्ग........इस कार्यालय अथवा कार्यक्षेत्र में एक अनभिज्ञ से अदना बालक के लिए सब कुछ नया-नया सा था......इस नए पल में हमे नए के भाव से मुक्त कर नियुक्ति दिनाँक के आधार पर महज चंद दिनों की वरिष्ठ साहिबा ने कार्यालय के कार्यपद्धति से हमे भलीभाँति अवगत करा....पूर्णतः सहज किया.......ऐसे पदवी में तो हमारी महारानी साहिबा सच मे हमारी महारानी ही थीं,क्योकि वह "ज्येष्ठ संपरीक्षक " जो ठहरी......उनके तो नाम मे ही ज्येष्ठता की झलक है......... पर इस ज्येष्ठता के भाव का अहसास कभी भी नही कराया......वरन हमारे समक्ष तो वे स्वयं को एक प्रशिक्षु की भांति ही प्रस्तुत करती रही.......♥️🔥
और बात कार्यक्षेत्र का हो,तो मजा तो तभी आता है,जब वहाँ कोई मज़ाक़िया अर्थात माहौल बनाने वाला कोई तो रहें........ अब इन्हें मजाकिया नही लेकिन "लइका" अवश्य बोल सकते है......क्योकि उनके हाव-भाव में बच्चे की सादृश्यता सहज ही झलकती है......उनका बात-बात पर हँसना..…अत्यंत गंभीर माहौल को भी आनन्दमय के देता है.........ये कुछ इस समान रहता था,कि तपते धूप में बारिश की हल्की फुहार मिल जाये.......इन सभी के अतिरिक्त उनकी न दिखने वाली गंभीरता भी उन में उच्च स्तर की है.......ऐसे सरल,सहज,सभी की हितार्थी मैडम सुश्री शुभम शर्मा जी को उनके जन्मदिवस के निमित्त हमारे हृदय के अंतरतम तल से उद्वेलित भाव के साथ अनंत,असीम एवं अनेकानेक बधाइयां....... शुभकामनाएं.......💐🎂🥰🔥🥳✨

ब्रह्मांड की समस्त शक्तियों के अध्येता प्रभु श्री राम से उनके ऐसे अनुग्रह की आकांक्षा है,कि पापा जी के मुखारबिंद पर हमारे अंतरमन को प्रसन्नता प्राप्त कराने वाली मुस्कान सदैव अंकित रहे........♥️🙏

हमारी आपसे यही आकांक्षा है,आपसे कि आप शीघ्र ही प्रशासन के शीर्ष पर पदस्थ होवें...... और हमे गर्वित होने का अवसर प्रदान करें......✨🔥🥰

इन्ही शुभकामनाओ के साथ.......💐🎂

Friday, December 9, 2022

आजादी की अमर कहानी

आजादी की अमर कहानी चलो सुनाऊ क्या है वो
बलिदानों की चिर कथाएं, सुनो बताऊं क्या है वो

सतत समर्पण करते आये, जन्मभूमि के मण्डन में
प्राण दिए न्यौछावर सबने,मातृभूमि के वंदन में
ललक जगी थी मातृभूमि,को आजादी दिलवानी है
वीर सपूत सब जाग उठे,माँ की सम्मान बचानी है
क्या कोड़े,क्या फाँसी,सब यत्नों को सहते जाना है
एकबिंदु मनोचित्तवृत्ति से,नौका को पार लगाना है
बलिदानों की कोटि कथाएँ,नही संभव गिन पाने में
देश के कुछ नेता ही जाने,बलिदानों के खजाने में
नमन करे बलिदानों को,आजादी है दिलवाए वो

नेता जी ने बल पर अपने,हिन्द-फौज को खड़ा किया
क्रांति की ज्वाला को उसने,पाल-पोष कर बड़ा किया
नेता जी के नेतृ गुणों ने,गोरो को लोहा मनवाया था
हिटलर जैसे तानाशाही से,नेता कहकर बुलवाया था
नरमपंथी के नरम नीति को,सिरे से अस्वीकार किया
आजादी के लक्ष्यों पर केवल,मातृभूमि से प्यार किया
तुम खून दियो आजादी दूंगा,नेता जी ने चिल्लाया था
दिल्ली चलो का नारा देकर,दिल्ली भी बुलवाया था
सतत प्रयत्नों के बूते पर,जय-हिंद बुलवाए है वो

तिलककाल में राष्ट्रवाद की, ज्वालायें प्रस्फुटित हुए
खुदीराम,चाकी,सावरकर,जैसे योद्धा अवतरित हुए
जन्मसिद्ध अधिकार मान,स्वराज्य भाव को बड़ा किया
होमरूल जैसे प्रकल्प को,तिलक-बिसेन्ट ने खड़ा किया
मराठा-केसरी के गुंजो से,सत्ता को भीतरघात किया
लाल-बाल की तिकड़ी से,खतरा गोरो ने भांप लिया
गणपति-उत्सव,शिवा-जयंती,प्रारम्भ जिसने करवाया था
जय शिवाजी,गणपति बप्पा,नारा जिसने लगवाया था
वीरप्रतापी तिलक महोदय,वंदे मातरम कहवाये वो

राजगुरु,सुखदेव,भगतसिंह,फंदों पर हँसते झूल गए
मातृभूमि की रक्षा खातिर,घर-परिवार को भूल गए
सहज उम्र,समकक्षी अपने,प्राण दिए बलिदानी वो
गोरी-नीति से खूब लड़े,पर हार न माने अभिमानी वो
आजाद गए आजाद हुए हम,कैसे भूलेंगे कहानी वो
समरांगण पर सदैव स्वतंत्र,स्वतंत्र गए अभिमानी वो
मूँछे ताने गुर्राते,हम शेर भवानी के है वो

Friday, November 25, 2022

न्यूज़

https://cgmitan.com/pandariyas-kripendra-tiwari-selected-in-food-inspector-recruitment-exam/

Wednesday, November 9, 2022

"कार्यक्षेत्र में प्रथम दिवस के लिए यात्रा और उसका अनुभव"



आज के दिवस का प्रारम्भ प्रातः काल मे 4:30 में हुआ। ये रहा अपने निज निवास पंडरिया से अपने कार्यक्षेत्र में गमन करने के लिए तैयारी का क्रम। कड़ाके के ठंड के दरमियाँ पूर्वाह्न 5:15 में पंडरिया से दुर्ग के छूटने वाली बस के लिए तैयार होकर सहशरीर 5:15 को पहुँचा ही था,कि बस 100 मीटर आगे निकल चुकी थी। ये एक संयोग मात्र ही था,कि बस के कंडक्टर के द्वारा वहाँ से बाइक में आगे बस में बैठने के लिए जाया जा रहा था। उन्होंने किसी चित-परिचित की भाँति मेरे मन की व्यथा को समझते हुए,मुझे अपने ही बाइक में बिना किसी ऐसे भाव के (मेरे बाइक में 3 लोग कैसे बैठेंगे) निःसंकोच बैठने के लिए कहा और बस में बैठाने/पकड़ाने में उनकी   महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह भी हो सकता है,कि वे अपने आर्थिक लाभ की दृष्टि से हमारी मदद किये,हो लेकिन जिस नेक उद्देश्य हेतु घर से पूजनीय माता-पिता जी के द्वारा मेरा विदा किया गया था। उस हेतु तो वे अतिधान्यवाद के पात्र है,अन्यथा वह उद्देश्य धरा का धरा रह जाता।

पूर्वाह्न 5:15 से चलने वाली बस का दुर्ग में 10:25 को पहुँचने में लगने वाला समय लगभग 5 घण्टा,10 मिनट का सफर का अधिकांश भाग शीतलहर से प्रभावित रहा और उससे बचते-बचते गर्मवस्त्र के आगोश में सोते हुए व्यतीत हुआ।

दुर्ग पहुँचने के पश्चात स्थानीय निज निवास पहुँचकर निजी वाहन से आदरणीय एवं सम्माननीय श्री गूगल मैप के माध्यम से सहायता प्राप्त करते हुए,वर्तमान में कार्यमुक्ति के पश्चात प्राप्त हुआ प्रथम निकाय "जनपद पंचायत,पाटन" में बड़े धूलधक्कड़ का सामना करते हुए पहुँचा।

पाटन का सम्बंध वर्तमान में हमारे राज्य के आदरणीय मुख्यमंत्री जी के गृहक्षेत्र से होने के कारण, इसकी छवि जिस प्रकार से मेरे मनमस्तिष्क में घर की हुई थी,उसको गहरा आघात पहुँचा। इस आघात का कारण यह रहा,कि मध्य मार्ग में पथनिर्माण कार्य के कारण हमे हुए परेशानी........धूल का गुबार ऐसा रहा,कि घर से बिना किसी मेकअप(साज-श्रृंगार) के मेकअप का आनंद प्राप्त हो गया।

जनपद पंचायत पाटन में पहुँचने पर क्षेत्रीय कार्यालय दुर्ग के द्वारा निर्धारित कार्यक्रमानुसार ज्येष्ठ संपरीक्षक आदरणीय श्री कमलेश कुमार सोनवानी के द्वारा मुझे इस कार्यालय से परिचित कराया गया। इस पल ही मन मे संकोच था,कि पहला दिवस में कफ्यले से सामंजस्य किस प्रकार बनाना है,लेकिन कुछ ही क्षण में सभी से परिचय पश्चात मैं स्वयं को अत्यंत सहज स्थिति में पाया,कि मैं अपने दुर्ग के ही कार्यालय में हूँ।

इसी क्रम में मेरे द्वारा अपने ज्येष्ठ अधिकारी जी को उपस्थिति पत्र प्रस्तुत किया गया। तत्पश्चात कार्य प्रशिक्षण का सत्र श्री सर के द्वारा लिया गया। प्रथम दिवस के मद्देनज़र ओझल की स्थिति से बचने के लिए तत्संबंधी सामान्य जानकारी ही प्रदान किया गया। जो मेरे लिए बिल्कुल ही नवीन था,यह एक विशेष अनुभव दिलाने वाला था। जो इस प्रकार था,जैसे कक्षा छठवी के बच्चे को संस्कृत सिखाया जा रहा है। कुछ चीजें हिंदी और संस्कृत में समरूपता के कारण जो समझ आता है,वैसे ही समझ आ रहे थे। तो कुछ ज्ञान लट्टलकार/लृट्टलकार की भाँति अत्यंत नवीन थे।


कुल मिलाकर यह दिवस एक जिज्ञाषु छात्र के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक रहा। जो जीवन के विशेष स्मरण के रूप में मनमस्तिष्क में अंकित हुआ।



Tuesday, November 1, 2022

" छत्तीसगढ़िया,सबले बढ़िया "

" छत्तीसगढ़िया,सबले बढ़िया "

उर्ध्वलिखित पंक्ति,जो छत्तीसगढ़वासियों के लिए स्वयं पर गर्व भाव को जागृत करने की पंक्ति है,की वर्तमान प्रासंगिकता किस स्तर की है.....??

क्या यह केवल नारा मात्र है......??
यह अपने में कौन-कौन से भाव को अन्तरग्रहीत किया हुआ है.....??

निःसंदेह स्वयं के किसी क्षेत्रविशेष से सम्बद्धता को लेकर व्यक्ति के मन मे गर्व का भाव होना सहज है......यह आपकी विशिष्टता के लिए भी आवश्यक है......उस क्षेत्र विशेष का नाम आपके व्यक्तित्व के आधार पर ख्यातिप्राप्त करें,इस हेतु भी महत्वपूर्ण है.........

उपर्युक्त बातो के इतर जब हम उस पंक्ति का उपयोग स्वयं की श्रेष्ठता के लिए करते है,तो क्या हम उसे समझ भी पाते है......कि क्या इस पंक्ति को कह देना बस ही,हमारे छत्तीसगढ़ के प्रति कृतज्ञता को व्यक्त करता है......??

प्रथमतः इस हेतु हमे इनके भाव को ग्रहण करते हुए,अपने में ऐसी क्षमता विकसित करना है,कि हम जिस क्षेत्र में हो,चाहे वह व्यापार-वाणिज्य,शिक्षा,कला,क्रीड़ा(खेल) आदि,उस क्षेत्र विशेष में नेतृवकर्ता रहें। जो लोगो के बीच मिसाल के रूप में पेश हो.......

द्वितीय: इस पंक्ति का प्रयोग करने का उद्देश्य,कदापि यह नही होना चाहिए,कि हम इससे दुसरो की निकृष्टता को सिद्ध करें.......शांतिप्रिय सहअस्तित्व की भावना हमारे संस्कृति का मूलाधार है......हमे सभी वर्गों,परंपराओं, संस्कृतियों के साथ "संगच्छद्वम् संवद्धवम्" के भाव से एकाकार होना चाहिए......ऐसे भाव ही पंक्ति की सार्थकता को सिद्ध करेगा......

तृतीय: हमारा प्रयास ही इस स्तर का हो,कि यह पंक्ति अपनी सार्वभौमिकता को प्राप्त करने की ओर अग्रसर हो.......यह अत्यंत प्रभावी तब होगा,जब इसे हमारे स्थान पर अन्य के द्वारा प्रयोग किया जाएगा.......जैसे कि व्यापार के क्षेत्र में गुजरात जैसे राज्य की स्थिति को हम सभी स्वीकार करते है......संस्कृति संरक्षण के मामले में दक्षिण भारत की स्थिति को स्वीकार करते है.......कुछ इसी तरह हमे अपनी क्षमता,स्वभाव से इस ओर प्रयास की आवश्यकता है.....

लेकिन दुविधा यह है,कि जो व्यक्ति इस पंक्ति को प्रयोग करता है,वह ही बड़े-बड़े मंचों,स्थानों या छत्तीसगढ़ से परे अन्य क्षेत्र में इसका प्रयोग करने से स्वयं को पृथक रखते है,उनमे छत्तीसगढ़ संस्कृति से स्वयं की सम्बद्धता प्रदर्शित करना हीनता का भाव पैदा करता है.......ऐसी वृत्ति का त्याग अत्यावश्यक है......इस हेतु हमे मराठा संस्कृति से सीख लेना चाहिए.......

इन्ही कुछ विचारो के साथ आप सभी को छत्तीसगढ़ निर्माण दिवस(राज्योत्सव) की अनेकानेक,गाड़ा-गाड़ा एवं असीमित शुभकामनाएं.......प्रयास करें हम सभी समृद्ध एवं नैतिक छत्तीसगढ़ निर्माण हेतु सतत प्रयत्नरत रहे.........

आपका......😊

Monday, October 31, 2022

"आरक्षण मामले का दंश झेल रहे छात्र "

लगभग दो वर्ष के कोरोना महामारी के दौर में सरकारी नियोजन(नौकरी) में हुए स्थगन के पश्चात "भर्ती प्रक्रिया" ने दम भरना प्रारम्भ ही किया था,गति का अनुभव कुछ मात्रा में छात्रों ने लिया ही था,कुछ एक भर्ती लाखो छात्रों के मन मे यह उम्मीद तो जगा रखा था,कि आने वाले सत्र हम अपना झंडा अवश्य ही परचम कर सकेंगे,अब रुकेंगे नही,थकेंगे नही,ले के रहेंगे आजादी जैसे नारो में आजादी को नौकरी से प्रतिस्थापित कर मन मे दृढ़ संकल्पित भाव से तैयारी कर रहे थे/है .........लेकिन इसी मध्य 2012 में लिए गए तत्कालीन सरकार का निर्णय,जिसमे छत्तीसगढ़ में आरक्षण की सीमा को 50% से उल्लंघित करते हुए....58% कर दिया था........जो मामला किसी याचिकाकर्ता के माध्यम से संवैधानिकता के आधार तले उच्च न्यायालय में दाखिल हुआ........ 

यहाँ से आरक्षण जैसे मुद्दों पर राजनीतिक बिसात की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है,यह छात्रों(राज्य प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहे माहौल में कहा जाए तो "एस्पिरेन्ट") के मध्य चर्चा का विषय बनाता है.......और कुछ समय मामला न्यायालयीन प्रक्रिया में ओझल होता है.....राजनीतिक चाल सिद्ध होता है मामला धर में लटका रहता है...... 

धीरे से राज्य के तैयारी कर रहे छात्र और सारे प्रशासनिक महकमा इस पद्धति को आत्मसात कर सहज हो गए थे......इस अनुरूप ही अपने को चयनित करने की स्ट्रैटेजी(रणनीति) में तैयारी करने प्रारम्भ किये और चयनित भी होते गए....... 

वह प्रक्रिया जिसके तहत हमने भी तैयारी की है,उसके अनुरूप ही भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए.......इसी दरमियान Cgpsc21 के साक्षात्कार (iterview) के एक दिवस पूर्व ही(अब इसे संयोग कहे या.....) 2012 आरक्षण संशोधन संबंधी मामला का निर्णय आता है,जो चलते आ रही 58% आरक्षण रोस्टर को असंवैधानिक घोषित करती है.......... 

जिसके पश्चात भी साक्षात्कार लिया गया......इस निर्णय संबंधी मामले की गंभीरता को ऐस्पिरेन्ट(छात्रों) के द्वारा तब तक नही समझा गया था,जब तक छात्र परिणाम का इंतजार कर-कर के तंग हो गए और अन्ततः यह ज्ञात होने तक,कि इस विलंब कारण तो 19 सितम्बर को माननीय उच्च न्यायालय के द्वरा दिया गया निर्णय था....... 

यह तो राज्य प्रशासनिक सेवा के संदर्भ में था........कुछ इसी प्रकार अन्य भर्तियां(जिनका दस्तावेज सत्यापन तक हो चक है,जिनकी केवल नियुक्ति आदेश का इंतजार था,ऐसे परीक्षा) जैसे खाद्य निरीक्षक आदि जैसे मामले ठंडे बस्ते में चली गई है........ 

इसी तारतम्य में लंबे वर्षो से अधर पर लटका हुआ "उप निरीक्षक" की परीक्षा,जो जैसे तैसे लिया जा रहा था,वह भी स्थगित किया गया.......जो भविष्य के अंधकार में छात्रों की भावनाओ,संवेदनाओ और धैर्य को समेटे हुए कही लुप्त सा प्रतीत होता है.......आगे क्रम में अनेक प्रक्रिया.....ACF साक्षात्कार,महाविद्यालयिन भर्तियाँ..... आदि है..... 

इस प्रकार छात्रों के समक्ष अब प्रश्नचिह्न खड़ा होता है,कि
1) उनके धैर्य की परीक्षा कब तक होगी......??.....(इसमें अब छात्रों के लिए चयन हेतु मुख्यतः दो परीक्षा पास करना अनिवार्य हो गया है,एक मुख्य परीक्षा और दूसरा धैर्य की परीक्षा)
2)इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन...??......(राजनीतिक स्वार्थगत प्रेरित सरकार या न्यायालयीन विलंबता........लेकिन यह न्यायालयीन मामला बना ही क्यो.....?)
3)आगे समाधान का राह भी क्या निष्पक्ष होगा,कि वह भी राजनीति से प्रेरित......??

कुल मिलाकर छात्रों के हितों को गर्त की ओर उन्नयित(धकेला) किया जा रहा है......सत्ता अपना स्वार्थ साधती रही है/साधती रहेगी.......और हम ठहरे कोल्हू के बैल जो घिसे चले जा रहे है......... 

ठीक है सबके लिए तो सरकारी नियोजन उपलब्ध न हो लेकिन जो है उसकी प्रक्रिया को तो निर्विवाद रहने दो........अब इसे अनुनय-विनय समझे या विरोध,ये समझने वाले के ऊपर है........ 

इन्ही विचारो के साथ आपके विचारों की अपेक्षा में आपका........😊 है......... 


Saturday, October 29, 2022

छठगीत गायन को लेकर आरु साहू का विरोध

प्रदेशवासियों के मध्य वर्तमान कालखण्ड में क्षेत्रीयता को लेकर एक विशेष वृत्ति,जिसे संज्ञात्मक रूप से "क्षेत्रवाद" कहा जाता है......यह प्रबलता से दृष्टिगोचर है.......

स्वयं की संस्कृति के प्रति गौरव एवं सम्मान की भावना निःसंदेह व्यक्ति की प्राथमिकता हो,इसमें कोई दो विचार नही है........लेकिन यह प्राथमिकता ही अंतिम(एको अहं द्वितीयो नास्ति) का पर्याय साबित हो,तो यह न तो उस संस्कृति और न ही उसके अनुयायी जनमानस के लिए हितकर साबित होगा......ऐसी संकीर्ण स्वभाव व्यक्ति की अस्वीकार्यता को इंगित करता है.......उनकी द्वयवृत्ति का परिचायक है.....

तात्कालिक परिप्रेक्ष्य में यह विचार इस कारण रखा जा है,कि छत्तीसगढ़ अंचल की सुप्रसिद्ध लोकगायिका सुश्री आरु साहू जी के द्वारा भारतभूमि के महापर्व के रूप में लब्धप्रतिष्ठ "छठपर्व" से संबंधित गीत का गायन किया गया........निश्चित ही हम सब प्रदेशवासियों के लिए गर्व का विषय होना चाहिए,कि हमारे अंचल की लोकगायिका के कला का दायरा(सीमा) इतना विस्तृत हो गया,कि वह छत्तीसगढ़ी के अतिरिक्त अन्य राज्यो से संबंधित गीतों का गायन कर रही है.........

इसी मध्य(बीच) प्रदेश के कुछ संगठन एवं समाज द्वारा उनके विरुद्ध #bycott का ट्रेंड चलाया जाने लगा.......जो इस नवपल्लवीत,समीपस्थ राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचो में स्थापित गायिका के लिए बाधा उत्पन्न कर रहे थे........

कला एक ऐसी विधा है,जिसमें धर्म,लिंग,वर्ण,भाषा,क्षेत्र की सीमा को आरोपित नही किया जा सकता है......और हमे उनके गायन को गर्व के विषय के रूप में आत्मसात करना चाहिए.......

यही पर हमारे दोगले मनोवृत्ति का पर्दाफ़ाश होता है,कि एक ओर हम ऋषि सुनक जी का ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद पर चुने जाने को लेकर प्रसन्न हो स्वयं को गर्वित भाव से पेश करने में किसी भी प्रकार का कसर नही छोड़ा है.......जो न तो पूर्णतः भारतीय है......न तो पूर्णतः भारतीय संस्कृति को आत्मसात किये हुए है.....अर्थात संबंद्धता नाममात्र का भी नही लेकिन उसको अपना बनाने की होड़ में हम सब इतने आगे........

वही दूसरी ओर सुश्री आरु साहू जी के द्वारा "छठगीत" गायन का विरोध मन मे अनेक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है.........कि क्या फिर
1.क्षेत्रवाद इतना ही श्रेष्ठ है.....?
2.अन्य परम्पराओ का सम्मान स्वीकार्य नही.....?

ऐसी वृत्ति हमारी असहिष्णुता का परिचायक है......जिसका त्याग अत्यंत आवश्यक है.......हम तो ऐसी संस्कृति के वाहक हैं, जो "वसुधैव कुटुम्बकम" आदर्शो को शिरोधार्य कर जीवनयापन करता है........हमे सभी संस्कृति के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए.......हमे ऐसे संकीर्ण भाव के दमन हेतु भरसक प्रयास और जागरूकता की आवश्यकता है........

इसी विचार के साथ आपका......😊

शानदार,ज़बरदस्त, जिंदाबाद.........सुश्री आरु साहू जी👍

Monday, October 24, 2022

" ज्ञान वाली दीपावली "


सनातन संस्कृति के औचित्यपुरक,गौरव और गरिमा के आधारस्तंभ प्रभु श्री राम जी के द्वारा अन्याय रूपी लंका,अधर्म और असुरता के पुर(गढ़) का दमन कर निज धाम आगमन के अवसर पर नगर/ग्रामवासियों द्वारा सम्पूर्ण क्षेत्र को तात्कालिक प्रकाशिक माध्यम(दीप) से अत्यंत हर्षोल्लास एवं प्रसन्न भाव से आलोकित कर दिया गया........

तब से(सतयुग) लेकर आज तक जनमानस के द्वारा प्रभु के आगमन के स्मृति स्वरूप दीप को अवली अर्थात कतार(पंक्ति) में प्रज्वलित किया जाता है.........इस प्रकार दीपावली का ये पावन पर्व........स्वयं में अनंत ज्ञान,संदेश,प्रेरणा एवं आदर्श को समाहित किये हुए भारत मे ही अपितु सम्पूर्ण वैश्विक पटल मनाई जाती है.......

लेकिन इस हर्षोल्लास और उत्सव के मध्य कुछ वर्गों की यह वृत्ति......जनमानस की भावना को आघात पहुचाती है.....जो है इस समयकाल में उत्सव संबंधी ज्ञान के प्रसारण की है.......

तत्समय में ही एक बड़े ब्रॉडकास्टिंग एजेंसी (xyz) के द्वारा दीपावली को स्मृति पर कुछ इस प्रकार लाया गया,कि महिलाओं का इस पर्व के आयोजन के साथ ही शोषण का क्रम चलते आया है.......

यह कोई एक दृष्टांत नही है,जिससे हमारी भावनाएँ आहत होती हो......इस क्रम में चली आ रही ज्ञान प्रदाय की वृत्ति में वर्तमान समायानुक्रम में कुछ अल्पता दृष्टिगत होती है,लेकिन वृत्ति तो व्याप्त है ही............जो प्रदूषण,अतिव्ययन आदि अनेक संदर्भो पर प्रदान की जाती रही है और जाती है......

उन सभी को इस तथ्य से अवगत कारण चाहूंगा,कि हममे बौद्धिक एवं तार्किक क्षमता इतनी तो विकसित है,कि हम अपने निर्णयन में सक्षम है.....उचित क्या और अनुचित क्या?........विश्वास की सीमा क्या होगी........??

यदि फटाखा फोड़ने(प्रदूषण सम्बन्धी) के लिए ज्ञान दीपावली सम्मत हो,तो निश्चित ही मैं फटाखा फोड़ने का पक्षधर रहूँगा........ इसका अर्थ यह नही हुआ,कि मैं स्वयं फटाखा प्रस्फुटित करता हूँ........हमारी दीपावली में तो हमारे द्वारा एक भी फटाखा प्रस्फुटित नही किया जाता है.........लेकिन संदर्भवश मुझे सीमा बदलनी पड़ेगी.......इसमें मैं किंचित(तनिक भर) संशय में नही हूँ

ज्ञान एक ऐसा धन है,जिसके प्राप्ति पर किसी भी प्रकार का संकोच व्यक्ति के हित के विपरीत है........जिसका प्राप्त होना ही वरदान है......वह भी स्वत: प्राप्त होना तो फिर ईश्वरीय कृपा है........आलोचनात्मक ज्ञान हितकारी भी होता है.......उसे भी सहर्ष स्वीकार किया जा सकता है......

लेकिन आलोचना एक विशेष प्रयोजन(समक्ष को नत भाव) से हो यह स्वीकार नही.......इस प्रयोजन पर चर्चा विस्तृत है.......जिसे हम आगे करेंगे.....

आज के लिए आप सभी को अंधकार रूपी अहंकार हो ज्ञान रूपी आलोक के माध्यम से विलोपित और समूल नाश करने का संदेश देने वाले पर्व दीपावली की अनंत एवं असीमित शुभकामनाएं......... आप सभी पर प्रभु श्री राम जी एवं माँ लक्ष्मी जी की आशीर्वाद आच्छादित हो/प्राप्त हो.......आपका जीवन आनंदमय हो ऐसी कामना है हमारी........

इन्ही विचारो के साथ आपका......😊

Thursday, October 6, 2022

माँ दुर्गा विसर्जन, पंडरिया

#माँ_दुर्गा_विसर्जन

 
पंडरिया नगर में दशहरा पश्चात गत वर्ष की भाँति माँ दुर्गा जी का विसर्जन होना था......लेकिन विसर्जन कार्यक्रम में हमारे ही जनमानस के द्वारा कुछ फूहड़ता,माँ की उपस्थिति को अपमानित करने वाली गीत-संगीत का चलाना........ जनमानस की आस्था को आहत करती थी।

इसी क्रम में नवरात्र पर्व प्रारम्भ होने के पूर्व नगर के गणमान्यजन विशेषत: व्यापारी संघ पंडरिया एवं पुलिस प्रशासन के साझा सहयोग एक नवाचारी पहल किया गया......यह पहल था,कि
1) माँ के विसर्जन को एक विशेष विषय पर आधारित थीम के अनुसार विसर्जन हेतु निकलना।
2) एक निश्चित समयांतराल में सभी की उपस्थिति।
3) समिति को प्रदाय झाँकी क्रमांक के अनुरूप अपनी झाँकी प्रस्तुत करते हुए आगे बढ़ना।
4)इस कार्यक्रम में किसी भी प्रकार की अश्लीलता,फूहड़ता को शामिल नही करना,जिससे जनभावना आहत होती हो।

यह नवाचार वर्तमान में अपनी प्रासंगिकता में लगभग पूर्णता को प्राप्त करने की ओर अग्रसर रहा.......इससे आने वाले समय मे नगर को सांस्कृतिक रूप से अनेक लाभ होंगे....
1) समितियों में सकारात्मक प्रतिस्पर्धा विकसित होंगी।
2) इससे नगर के समिति एवं मंडल में रचनात्मकता का विकास होगा।
3) जाने अनजाने होने वाले माता के अपमान पर अंकुश लगेगा।
4) आने वाले वर्षों में पंडरिया नगर का नाम ख्यातिलब्ध होगा....साथ ही ऐसे प्रदर्शनों से समीपस्थ ग्रामीण बन्धुओ,माता-बहनों के द्वारा झाँकी दर्शन हेतु आगमन होगा।

जो निश्चित ही पंडरिया में पूर्व के राजकालीन परिदृश्य में दशहरा में जो परिवेश रहता था,उसे पुनः प्राप्त करने में सहायक होगा.....और एक उत्कृष्ट परमपरा विकसित होंगी........

ऐसी सोच के साथ आपका.......😊❤️🙏

Monday, October 3, 2022

नवरात्र आयोजन:- गरबा

सनातन धर्म बह्यन्तर कारको से अधिक अभ्यंतर कारको से विकृतता की ओर अग्रसर है..........

"गरबा" के नाम पर जो आयोजन किये जा रहे है,उसमे मुख्य विषय अर्थात केंद्रबिंदु,दैवीय आराधना का होने के अतिरिक्त(बजाय).....सारे वो साधन उपलब्ध है,जो मनोरंजन एवं अन्य मानवीय स्वार्थिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु आवश्यक है। इस तारतम्य में अनेक मंडल एवम समिति माता की आराधना एवं भक्ति जैसे तथाकथित पोस्टर छपवा कर ऐसे सेलेब्रिटी(नायिका) को मुख्य आथित्य अथवा नृत्य/गायन प्रदर्शन हेतु आमंत्रित करते है........जिन्हें माता से दूर दूर तक कोई सरोकार नही और वह मनमाने ढंग से नृत्य/गायन,जो लोगो के बीच एक मनोरंजन(@$#%) माहौल पैदा कर दे,प्रस्तुत करती है। इस पूरे क्रम उनका कोई दोष नही,क्योकि वो तो अपने कार्यक्षेत्र के अनुरूप कार्य कर रहे है। उनका तो कार्य ही है,रंगमंच पर ऐसे रस से युक्त कार्यक्रम की प्रस्तुति करना,जिस हेतु वह लब्धप्रतिष्ठ है।

इसमें मुख्य रूप जवाबदेह तो हम और हमारा ये समाज है,जो अपने ही आराध्य(माँ दुर्गा) को आधार मानते हुए कुछ तुच्छ रसास्वादन हेतु ऐसे कार्यक्रम आयोजित कर रहे है अथवा उसमे शामिल हो रहे है।

गरबा जैसे सांस्कृतिक नृत्य के आत्मीकरण,स्वीकार्यता एवं  प्रसार का किंचित भी विरोध नही.......अपितु उनके मूलभूत तत्व(उद्देश्य/आराधना) को अल्पीकृत करना स्वीकार नही..........

और यदि जनमानस के क्षेत्रीय गर्व की भावना को केंद्रित करते हुए बात कही जाए तो हमे प्राथमिकता "सुवा नृत्य","जसगीत" एवं "कर्मा नृत्य" को देना चाहिए,जिससे हममे स्वयं की क्षेत्रीय संस्कृति के प्रति गर्व का भाव जागृत होगा...........और संस्कृति संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य भी पूर्ण होंगे.........

और यह स्थिति फिर वर्तमान में कही जा रही तथाकथित गर्वयुक्त ध्येयवाक्य "छत्तीसगढ़िया,सबले बढ़िया" को प्रासंगिकता के पैमाने पर अस्तित्वमय करेंगी और जो अपनी यथार्थता को प्राप्त करेगी.......🤔🤔🤔

Sunday, October 2, 2022

साक्षात्कार:-29 सितम्बर,2022

🛑डॉ. मोतीलाल बाचकर सर बोर्ड 

⭕बाचकर सर:-1)मूलतः कहा के है?
2)आपने गणित(PCM) में बी.एस सी. किया है।
3)आप कौन सा पद प्राप्त करना चाहते है?
4)आप प्रशासन में क्यो आना चाहते है?
5)सारे पदों में DC को ही प्राथमिकता क्यो?
6)DC बनने पर क्या कार्य करेंगे?
7)वनांचल क्षेत्र के विकास में आपका योगदान।
8)आर्थिक स्थिरता तो अन्य पदों में भी?
9)गणित(PCM) में बी.एस सी. के पश्चात एम.ए.(इतिहास) क्यो? 
10)संपरिक्षक के क्या कार्य होता है?
11)अनुदान प्राप्त निकाय क्या है? उनका नाम बताइये।

⭕साव सर:-1)गणित का प्रशासन में क्या उपयोग है?
2)एक पेपर में कुछ चित्र(त्रिभुज,चतुर्भुज) बनाकर उसका क्षेत्रफल लिखकर समझाइये।
3)कवर्धा में मिट्टी कौन सी पाई जाती है?
4)मिट्टी का स्थानीय नाम।
5)कवर्धा की मुख्य फसल।
6)गन्ने का ही उत्पादन क्यो?
7)कवर्धा के वृष्टि छाया क्षेत्र होने के क्या कारण है?
8)मैकल पर्वत श्रेणी का मानसून पर प्रभाव।
9)छत्तीसगढ़ में औसत वार्षिक वर्षा।
10)स्थल पवन और जल पवन क्या है?
11)दोनों के चलने का समय और मानसून पर प्रभाव
12)दक्षिण पश्चिम मानसून का भारत मे प्रवेश और लौटती हुई मानसून को चित्रवत समझाइये।
13)वाष्पीकरण और संघनन क्या है?
14)बादल निर्माण की प्रक्रिया समझाइये।
15)अम्ल वर्षा क्या है?
16)डोंगरगढ़ से बिलासपुर के मध्य नदी का वर्णन 

⭕सदस्य:-1)लंपी वाइरस क्या है? सरकार के प्रयास।
2)राज्य शासन की फ्लैगशिप योजनाएं
3)राजीव गांधी किसान न्याय योजना की प्रासंगिकता।
4)क्रयशक्ति क्षमता क्या है?
5)आपदा प्रबंधन क्या है?
6)परिस्थिति आधारित प्रश्न:-किसी क्षेत्र में रात्रि काल मे बाढ़ की स्थिति होने पर आपका क्या प्रतिक्रिया एवं निर्णय होंगे? 

⭕सदस्य:-1)यूरोप महाद्वीप को पूर्व,मध्य और पश्चिमी क्षेत्र में विभाजित कीजिये।
2)रूस मुख्यतः किसी महाद्वीप में शामिल है?
3)अफ्रीका महाद्वीप के 5 देश एवं उनकी राजधानी
4)दक्षिणी अमेरिका के 5 देश व उनकी राजधानी
5)अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष का मुख्यालय एवं उनके कार्य
6)IMF का ब्रिटेन की वित्तीय संकट में भूमिका।
7)NATO क्या है,उसका पूरा नाम एवं सदस्य संख्या
8)रूस-यूक्रेन संकट में नाटो(NATO) की भूमिका।

Wednesday, September 14, 2022

कार्यालयीन प्रशिक्षण अनुभव

              ★फीडबैक★

विषय:-कार्यालय,क्षेत्रीय उपसंचालक,छत्तीसगढ़ राज्य संपरीक्षा,दुर्ग की ओर से विभाग एवं कार्यालय के क्रियाकलाप संबंधी जानकारी हेतु दिनांक 07/09/22 से 09/09/22 तक त्रिदिवसीय प्रशिक्षण सत्र पर प्रतिविचार बाबत।

•प्रथम दिवस:-दिनाँक 07/09/22 को ज्येष्ठ संपरिक्षक मैम श्रीमती सरला साहू एवं सुश्री मिथिलेश्वरी शर्मा जी के द्वारा प्रातः 11 बजे से छत्तीसगढ़ राज्य संपरीक्षा प्रक्रिया एवं स्थानीय निकाय के संबंध में प्राथमिक परिचय दिया गया। जिससे हमें अपने कार्यालय के द्वारा किये जा रहे अंकेक्षण कार्य हेतु निकाय संबंधी जानकारी प्राप्त हुए। सबसे महत्वपूर्ण यह रहा,कि हमे हमारे विभाग का पूर्व नाम "स्थानीय निधि संपरीक्षा" का नामनुरूप जानकारी एवं वर्तमान नाम रखने संबंधी प्रासंगिकता समझ मे आयी।
             द्वितीय सत्र श्रीमती गुपेश्वरी मैडम जी का रहा,यह सत्र मेरे लिए अति महत्वपूर्ण रहा,क्योकि इस कार्यालय संबंधी वास्तविकता एवं यथार्थ से परिचय मैंम से प्रात्यक्षिकता के फलस्वरूप ही प्राप्त हुआ। जिस तारतम्य में अंकेक्षित निकाय में किये अंकेक्षण कार्य के फलस्वरूप हमारे द्वारा अपनायी जाने वाली प्रतिवेदन की प्रक्रिया को बड़े ही सहज एवं सरल भाषा शैली में व्यक्तिगत अनुभव के माध्यम से समझाया गया। प्रतिवेदनों का निकाय से संचालनालय तक पहुचने की स्तरबद्ध जानकारी उल्लेखनीय रही। तथा प्रतिवेदनों का विधान सभा पटल मे रखने की प्रक्रिया समझाकर एवं वार्षिक प्रतिवेदन को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया गया।


•द्वितीय दिवस:-दिनाँक 08/09/22 का प्रथम सत्र श्रीमती अरुणा पवार जी तथा एवं श्री दीनबंधु चतुर्वेदी सर का रहा,लेकिन किसी कारणवश श्री चतुर्वेदी सर की अनुपस्थिति में उस सत्र का संचालन श्री होमन कुमार ठाकुर सर के द्वारा किया गया,जिसमें "ऑडिट ऑनलाइन" विषय पर कंप्यूटर के माध्यम से प्रत्यक्ष प्रशिक्षण दिया गया,विषय का नया स्वरूप एवं तकनीक आधरित होने के कारण उक्त विषय पूर्णरूपेण समझ नही आया लेकिन विषय के प्रति समझ पैदा हुई।
         आगे अरुणा मैम के द्वारा संपरीक्षा अधिनियम,1973 का वाचन करते हुए,उसके सैद्धान्तिक स्वरूप से अवगत कराया गया।
                  
              द्वितीय सत्र श्री अतुल कुमार अग्रवाल एवं श्रीमती रामेश्वरी मैम के द्वारा लिया गया। अग्रवाल सर का द्विदिशीय वार्तालाप एवं प्रश्नोत्तर शैली,विषय के समझ हेतु मन को सहज ही आकर्षित करता है और साथ ही रामेश्वरी मैम का समझाने के प्रति उत्सुखता।
             श्री अग्रवाल सर के द्वारा हमारे अब तक के कार्यालयीन समझ का आंकलन कर गबन,अंकेक्षण शुल्क एवं मासिक माहिती की जानकारियां प्रदान किया गया।जिसमें रामेश्वरी मैम के द्वारा भी निकायों के उक्त विषय संबंधी परिचय कराया गया।

•तृतीय दिवस:-दिनाँक 09/09/22 को श्री दिनेश कुमार सर के द्वारा बजट,स्थापना,वेतन निर्धारण एवं अधिभार संबंधी समस्त जानकारी सह अधिनियम प्रदान किया गया। श्री सर जी का प्रशिक्षण सत्र के साथ उनकी उपस्थिति इस कार्यालय में एक अभिभावक की भूमिका को पूरा करता है। सर के द्वारा प्रदत्त वेतन निर्धारण एवं अवकाश संबंधी जानकारी अत्यधिक आकर्षित करने वाला था।
                 

Sunday, October 17, 2021

"75 दिनों का विश्वप्रसिद्ध दशहरा"

भारतीय परिक्षेत्र में दण्डकारण्य भूमि,जिसे आज हम सभी बस्तर के नाम से जानते हैं,प्रभु श्री राम जी के द्वारा सर्वाधिक समय व्यतीत किये गए स्थल के रूप में लब्धप्रतिष्ठित है। वर्तमान का बस्तर निश्चित ही देश में अपनी नक्सल गतिविधियों के कारण चर्चित रहता है,लेकिन हम बस्तर भूमि की समृद्ध जनजातीय एवं साझा सांस्कृतिक विरासत को नजरअंदाज नहीं कर सकते। जनजातीय संस्कृति में मुख्य रूप से विश्वप्रतिष्ठित बस्तर के दशहरा का स्थान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। चूँकि यह भारतीय परिवेश में मनाए जाने वाले दशहरा पर्व से पूर्णतः भिन्न होती है। जिसमें रामायण महाकाव्य के अनुसार,न तो रावण का दहन होता है और न ही प्रभु श्रीराम जी के विजय का उत्सव,बल्कि यह आश्विन मास शुक्लपक्ष दशमी को माँ दुर्गा जी के द्वारा सामान्य जनमानस के रक्षार्थ हेतु किए गए अत्याचारी महिषासुर के शिरोच्छेदन से संबंधित है। बस्तर में दुर्गा माता के रूप में माँ दंतेश्वरी की पूजा की जाती है। बस्तर का दशहरा,सामान्यतः मनाये जाने वाले एक दिन के दशहरे की अपेक्षा 75 दिनों तक चलने वाला पर्व है,जिसमें मनाया जाने वाला रस्म मुख्यत: अनवरत रूप से तेरह दिनों तक चलता है। 


इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बस्तर में आरुढ़ "काकतीय वंश" से जुड़ी हुई है। बस्तर रियासत के राजा "पुरुषोत्तम देव" के द्वारा पैदल मार्ग से चलकर जगन्नाथ पुरी की यात्रा की गई। यहां पुजारी ने राजा पुरषोत्तम देव के समर्पण भाव से प्रसन्न होकर उन्हें "रथपति" की उपाधि से विभूषित किया। जब पुरुषोत्तम देव का वापस बस्तर आगमन हुआ तो धूमधाम से बस्तर का दशहरा उत्सव मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई,तभी से "गोंचा" अर्थात दशहरा में रथचालन की परंपरा प्रारंभ हुई। 

छत्तीसगढ़ के अंचल में मनाए जाने वाले प्रकृति पूजन का पर्व "हरेली",जिसे श्रावण माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है,से 75 दिनों तक चलने वाली इस पर्व की शुरुआत "पाट जात्रा" कार्यक्रम से होता है। आमावस्या को माचकोट जंगल(बस्तर) से लाई गई सात लकड़ियों के गोला की पूजा की जाती है,तत्पश्चात सात "मांगुर मछलियों" की बलि चढ़ाई जाती हैं तथा लाई-चना अर्पित किया जाता है। इस लकड़ी से काष्ठकार्य में प्रयुक्त होने वाले औजार के बेंठ(हत्था) बनाकर रथनिर्माण की प्रक्रिया को प्रारंभ किया जाता है। रथ निर्माण का कार्य स्थानीय स्तर पर विशिष्ट ग्राम एवं समुदाय विशेष के व्यक्तियों द्वारा संपन्न किया जाता है। इस कार्य में श्रावण,भाद्रपद और आश्विन माह का प्रथम पक्ष(कृष्णपक्ष) व्यतीत हो जाता है। 


आश्विन शुक्ल पक्ष के प्रथम तिथि प्रतिपदा,जिससे नवरात्र प्रारंभ होता है,से प्रथम रस्म "काछिनगादी" प्रारंभ होती है,जिसमें एक विशिष्ट समुदाय "महरा" की कन्या को "काछिनदेवी" बनाकर गद्दी पर बैठाया जाता है,जो गद्दी विशेषत: बेल(बबूल) के कांटो से बनी होती है। आगे इस पर्व के सफलतापूर्वक संचालन एवं इसके निर्विघ्न समापन हेतु "हलबा" जनजाति के एक सदस्य को जोगी बनाकर,उसे 9 दिन का व्रत रखवाकर योग साधना में बैठाया जाता है,जिनके साधना का परिणाम दशहरा पर्व का निष्कंटक पूर्ण होना है। 

माता सती के दाँत के गिरने के कारण शक्तिपीठ के रूप में ख्याति प्राप्त "माँ दंतेश्वरी देवी" बस्तर की कुलदेवी है,जो इनकी आराधना का केंद्र बिंदु है। रथयात्रा में माँ दंतेश्वरी के छत्र को रथारूढ़ कर नगर भ्रमण कराया जाता है जिसके चारों ओर "गौर लोकनृत्य" करते हुए जनजाति समाज आनंदचित्त रहते हैं,इस गौर नृत्य को प्रसिद्ध मानवशास्त्री "वेरियर एल्विन" ने संसार का सबसे "सुंदरतम नृत्य" कहा है। इस प्रकार नौ दिन के नवरात्र पर्व के सफलतापूर्वक समापन पर "जोगी उठाई" कार्यक्रम किया जाता है,जिसमें नौ दिन पूर्व बैठे जोगी को विशेष भेंट अर्पण कर योग साधना से उठाया जाता है और जोगी उठाने के पश्चात दंतेवाड़ा में स्थित इष्ट देवी "मावली माता" को पालकी में बिठाकर बस्तर लाया जाता है जिसे चार माड़िया जाति के व्यक्तियों द्वारा कंधे से उठा कर लाया जाता है। 

आगे नवरात्र का समापन होता है तथा विजया दशमी तिथि को "भीतररैनी" अर्थात रथ को नगर के भीतर भ्रमण कराया जाता है और रथ को परिक्रमोपरांत प्रथा के अनुसार एक विशेष ग्राम "कुम्हड़ाकोट" ले जाते हैं,जहां सभी नागरिकों को रूमाल व बीड़ा(पान) देकर सम्मानित किया जाता है। विजयादशमी के पश्चात आश्विन शुक्ल एकादशी को ग्राम के राजा के द्वारा नवोदित अन्न को प्रसाद के रूप में माँ को समर्पित किया जाता है। 

पूरे पर्व का समापन समस्त समाज में समन्वय को स्थापित करने वाले बैठक के रूप में "मुड़िया दरबार" आयोजित किया जाता है,जिसका आयोजन बस्तर अंचल के राजा के द्वारा किया जाता है। जिसमें ग्राम वासियों की सामान्य समस्याओं पर चर्चा कर उसका निराकरण किया जाता है।इस प्रकार इस आयोजन के अंत में दंतेवाड़ा से लाई गई "मावली माता" को पुनः विदाई सम्मान देते हुए दंतेवाड़ा ले जाया जाता है जिसे स्थानीय स्तर पर "ओहाड़ी रस्म" कहते हैं। इस प्रकार विश्वप्रसिद्ध बस्तर के दशहरा उत्सव सम्पन्न होता है।

Thursday, May 27, 2021

ब्राह्मणजनों का दायित्व

आज के समाज को विद्वत पंडितो की आवश्यकता है,क्योकि बिना किसी तर्क के चली आ रही परंपरा आज के बुद्धजीवी वर्ग को रूढ़िवादी अथवा अंधविश्वास प्रतीत होती है........इस प्रकार,ऐसे ज्ञानवर्धन से सांकेतिक और प्रेरणादायी परंपरा मे रूढ़िवादी रूपी धूल,जो परत के रूप में जमी हुई है,जिससे यह उपयोगिताविहीन अथवा व्यर्थ लगती है,उस धूल के निवारण और स्वच्छिकरण हेतु आवश्यकता है............


क्योकि आज जनमानस का संस्कृत के प्रति विलगाव हो गया है,कारण भी सही है,कि संस्कृत के ज्ञान से हमे प्राप्त क्या होगा....???

तो संस्कृत के इस विमुखीकरण के दौर में संस्कृत की समझ किसे.......परंपरा की समझ किसे....??

तो ऐसे पंडितो/ब्राह्मणजनों की अनिवार्य आवश्यकता है,जो समाज को शास्त्ररूपेण मार्गदर्शित कर हमारे मन मस्तिष्क में बैठे समस्त शंशयो का निराकरण करे,जिससे हममे ऐसे अनमोल विरासत के प्रति लगाव तथा गर्व के भाव पैदा हो.........

प्राचीन समय में समाज का मार्गदर्शन ही ब्राह्मणों का कार्य हुआ करता था........जो आज के ब्राह्मणों में पण्डित्यता के अभाव में ऐसी बाते कही ओझल सी हो गई है,यही कारण है ब्राह्मण तात्कालिक समय में हास्य के पात्र तथा उनके द्वारा कराई जाने वाली कर्मकाण्ड आडंबर प्रतीत होता है............


इस निमित्त संस्कृति संरक्षण का समस्त कार्यभार केवल ब्राह्मण(जिनमे पांडित्य के गुण हो) के ऊपर ही टिकी हुई है.......👍👍

:-कृपेन्द्र तिवारी

Friday, January 8, 2021

अमेरिकी संसद में हिंसा

देश की सत्ता कैसे चले,ये हमको क्यो सिखलाते तुम।
लोकतंत्र के सही मायने,ये हमको क्यो बतलाते तुम।।

स्वयं के संसद में देखो,कि कैसे हिंसा प्रस्फुटित हुए।
स्वार्थसत्ता के भावों से,जनमत से क्यो तुम रुष्ट हुए।।

देशवासियो के निर्णय और जनमत का सम्मान करो।
सहर्ष गर्व के भावों से तुम सत्तापद से विश्राम करो।।

:-कृपेन्द्र तिवारी......







Thursday, December 31, 2020

नववर्ष,2021 पर विचार

मंदिर में दूध चढ़ाए तो,दीनन की चिंता सताने लगी
मंदिर में पैसे चढ़ाए तो,अस्पताल की यादें आने लगी।

लेकिन नववर्ष की बेला में,गहमागहमी की ये रेला में
क्या किसी ने ऐसा सोचा कि,दे कंबल उन गलियारों में।

उन राहो में न चमकचांद,बस बिखरी है दीनता की आंध
राहो में नववर्ष मनाओ तुम,जिससे मीले असीमित सुकून
जो केक काटते राहो में,रंगरलियां हो चौक-बाजारों में
इन पैसों का संयोग करो,दिनन के सुख में उपयोग करो।।

तो सोचु क्यो मैं दूध चढ़ाऊँ,क्यो न उसे मैं बांट आउ
नर में श्रीहरि नारायण देख,इन भावो को मैं बिखराउ।
पहले तो ज्ञानवानियो खुद,ऐसे गुणो को जगाना तुम
तत्पश्चात सनातनियो को,सार्थक पाठ पढ़ाना तुम ।।

:-कृपेन्द्र तिवारी........✒️✒️✒️

Saturday, December 19, 2020

संगठित होना है जरूरी.....

संगठित_होना_है_जरूरी

भारतीय इतिहास संघर्षो का इतिहास है।इसमे अनेक आक्रमणकारी प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक आये,उनके द्वारा स्थानीय शासन से परस्पर विस्तारवादी नीतिओ को लेकर संघर्ष होते रहे.......लेकिन इतिहास के अध्ययन का उद्देश्य ही होता है,कि पूर्व में दोहराई गई गलतियो का पुनःआचरण न हो....

भारतीय इतिहास में इस संघर्ष और गुलामी के पीछे के कारण को हम तर्कसंगत दृष्टिकोण से देखे तो स्पष्टीकृत होता है,कि हममे चिरकाल से लेकर अधुनातन काल तक संगठन,परस्पर सहयोग और समन्वय की भावना का अभाव रहा है। यही कारण रहा कि हमारा भारत देश एक केंद्रीकृत राष्ट्र के रूप में पूर्व से छवि बनाने में असफल रहा है....केवल अपवाद जैसे चंद्रगुप्त मौर्य जैसे शासको के शासनकाल को छोड़कर......

महत्वपूर्ण कारणों का अध्ययन करे तो दृष्टिगत होता है,कि हमारी स्वार्थिक भावना तथा साम्राज्यवादी नीतियां ऐसी रही है,कि जो हमारे लिए ही घातक सिद्ध होती रही.....ऐसी विचारधारा कि "आक्रमणकारी शत्रु राज्य पर आक्रमण कर रहा है तो मुझे क्या मतलब" ऐसे भाव ही हमारे गुलाम होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण है.......जो हमारे पूर्वजो के संकीर्ण मानसिकता का उपज है..........

हमे "unity is strength" अर्थात एकता में ही शक्ति है के मूलभूत भाव को आत्मसात करना चाहिए.....और आज के परिदृश्य में यही हमारी एकता का भाव,आक्रमणकारी बाबर के सेनापति "मीर बाकी" के द्वारा 1528 में तोड़े गए मंदिर के पश्चात किये गए मस्जिद निर्माण के क्रूरतम कदम का निवारण आज कर रही है......इसका मुख्य कारण है हिन्दू पक्ष का जागृत होना.....एकमय होना.......सुसंगठित होना.......

इस जागरण और एकमय भावना को प्रसारित करने के संघर्ष में लाखों हिन्दू बंधु-बांधव और हमारे पूर्वजो ने अपने प्राणों की आहुतियां दी है......इसी जागरण और एकता के सूत्र में पिरोने का संकल्प ले "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" की नींव रखी गई......जो सार्थक और प्रभावी रूप से लोगो के अंतर्मन में राष्ट्रप्रेम,धर्मप्रेम एवं समर्पण,ऐसा कि सर्वस्व न्यौछावर कर दे........ऐसे भाव को भारतीय जनमानस में संचार कर उनके हृदय में अन्तरग्रहीत कराये.....

इसका प्रतिफल हमारे समक्ष है,कि वो एतिहासिक क्षण के हम साक्षी बन रहे है,जिनके लिए लाखों बलिदान हुए......."श्री रामचंद्र जी के मंदिर" का निर्माण अपने चरम पर है........

यह मंदिर केवल मात्र मंदिर नही है,बल्कि यह वह राष्ट्रमन्दिर है,जो हमे याद दिलाता रहेगा कि ये हमारी एकता का प्रतिफल है और सदैव भविष्य में इस भावना को जागृत करने हेतु प्रेरित करता रहेगा...........

तो लेख के लेखन का सार स्पष्ट है,कि हम यदि संगठित है......तो भारतवर्ष को विश्वगुरु बनने से कोई नही रोक सकता........

आपका:-कृपेन्द्र तिवारी

Thursday, December 17, 2020

गुरु घासीदास जयंती

#गुरु_घासीदास_जयंती
भारतीय समाज अनेकानेक वर्षो से फलीभूत रहा है...लेकिन समयचक्र में परिवर्तन के साथ समाज मे कुछ निम्न मानसिकताओं, अंधत्व,भेदभाव,समरसता का अभाव ने स्थान ले लिया...निश्चित ही ये विभिन्न कारक प्रगतिशील समाज के लिए घातक है.......इस हेतु समय-समय पर धार्मिक सुधार आंदोलन हुए....जिसमे 13-14 शताब्दी के मध्य भक्ति आंदोलन चरम पर था...ये धार्मिक आंदोलन धार्मिक जागरूकता फैलाने तथा धर्म के प्रति लोगो का ध्यान आकृष्ट करने का कारण बना...लेकिन इस समयकाल में भी कुछ संतो के द्वारा अपने रचनाओं में तात्कालिक समाज की कुरीतियो और उनकी जड़तारूपी दशा को इंगित कर उस पर कुठाराघात करने का भरसक प्रयास किया गया...जिसमे प्रमुख रूप से संत कबीर दास,तुलसीदास,नानक,दादूदयाल इत्यादि थे...जो सामाजिक सुधार के क्षेत्र में विशेष ध्यान एवं योगदान दिए.....

भारतीय समाज मे हुए अनेक आक्रमण,आतताइयों तथा कुछ प्रबुद्ध वर्ग(जो मात्र जाति से उच्च हो के साथ-साथ प्रत्येक वर्ग,जो सम्पन्न हो) के द्वारा हमारे समाज का शोषण तथा सामाजिक तानेबाने को ध्वस्त करने का प्रयास किया गया जो इस हेतु पूर्णरूपेण जिम्मेदार है......सामाजिक क्रांति के इसी कड़ी में  सन 1756 में छत्तीसगढ़ की पावन धरा में गिरौदपुरी(बलौदाबाजार) नामक स्थान में एक सामाजिक संत "गुरु घासीदास" जी का प्रादुर्भाव हुआ...

जिन्होंने भारतीय समाज मे व्यापित विकृतियो,जिसमे भेदभाव का स्थान चरम पर था,के उन्मूलन हेतु अविस्मरणीय योगदान दिए...बचपन से वैराग्य वृत्ति के धनी घासीदास जी ने सन 1820 में सतनाम पंथ की स्थापना की...जिसके अनुयायी "सतनामी" अर्थात "सत्य के नाम पर चलने वाला" कहलाये...

इन्होंने अपने मत में मूर्तिपूजा,समाज मे व्याप्त पशुबलि,हिंसा जैसे मान्यताओ को सिरे से नकार कर उनका विरोध किया...तथा अपने पंथ के अंतर्गत निम्नांकित 7 उपदेशो के माध्यम से सामाजिक क्रांति लाने का प्रयास किये...
1.मादक पदार्थ से परहेज
2.मांस भक्षण का परित्याग
3.सामाजिक समरसता के भाव का अंतर्ग्रहण
4.मूर्तिपूजा का विरोध
5.गयो से हल के माध्यम से जोताई बंद
6.दोपहर में हल चलाना बंद
7.सत्पुरुष सतनाम की निराकार उपासना.......आदि

आज इस पावन दिवस पर घासीदास जी के द्वारा दिये उपर्युक्त उपदेशो को हम जनमानस अपने जीवन मे किस स्तर पर अंतर्ग्रहित किये है...इस हेतु हमें मंथन करने की आवश्यकता है...जो गुरु घासीदास जी की जयंती को मनाने के लिए उचित कारण होगा,कि उनके उपदेश को आत्मसात कर सत्य के मार्ग पर चले और आज के समाज मे जागरूकता फैला सके...यही उनके जयंती पर हमारी सच्ची एवं निष्पक्ष भावार्पण होगी...

क्योकि आज समाज केआ भ्रष्टाचार,चोरी,झूठ के बुनियाद पे टिके होने से निवारण का उपाय मात्र...उनके उपदेशो का ससम्मान आचरण करना है.......यही प्रति हमारी सच्ची कृतज्ञता होगी ❤️❤️❤️💐💐💐🙏🙏🙏


#आपका:-कृपेन्द्र तिवारी

Tuesday, October 13, 2020

जन्मदिवस शुभकामनाये..... दीवान सर.....

शासकीय ई. राघवेन्द्र राव स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय में सुचना प्रद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष,विज्ञान महाविद्यालय में ज्ञानार्जन हेतु आगंतुक नवपल्लवीत पुष्परूपी छात्रों के लिए एक ऐसे प्रेरणा पुंज,जिससे प्रकाशित होकर छात्र इस विशाल चराचर,प्रतिस्पर्धात्मक भौतिक जगत के आभामंडल में एक सूक्ष्म तारा (जो स्वयं प्रकाशित होने में सक्षम हो) का अतित्व स्थापित कर पाता है.........


ऐसे गुरु,जो महाविद्यालयीन सीमा को उल्लंघित कर प्रत्येक छात्र(जिसको एक मात्र सहारे की तलाश हो) को अपने प्रेरणास्पद वचनों से छात्रो को अपने इस सूक्ष्मतम जीवन मे उन विशालतम उचाईयो को प्राप्त करने के लिए(जिसकी परिकल्पना छात्रजीवन में करना,मात्र एक काल्पनिक कथा हो) मार्गदर्शित एवं प्रेरित करती है............


एक ऐसे नेतृत्वकर्ता,जिनके नेतृत्व की प्रामाणिकता इस तथ्य से अनुभवित किया जा सकता है,कि उनका कार्यभार अर्थात जिम्मेदारियों का दायरा क्या रहा है......इसकी चर्चा करना मात्र चर्चा की अनंतता को इंगित करता है अर्थात ऐसी चर्चा जिसका अंत न हो........इसका उदाहरण महाविद्यालयीन स्तर पर हो या चाहे अन्य क्षेत्र में हो..........चाहे वह सूचना प्रद्योगिकी विभाग के विभाध्यक के पद का संचालन करना हो या ऐसे शासकीय संगठन(जिसका उद्देश्य समाज के निर्माण करने वाले स्वयंसेवको का निर्माण करना हो)NSS,NCC के जिम्मेदारियों का पालन राष्ट्रीयता के भावना से परिपूरित होकर करना,जिससे यह स्वयंसेवक आगे समाज को एक स्वस्थ,सुगम एवं स्वत्रंतता रूपी दिशा में संचालित करे.........चाहे वह राज्य सरकार के निर्वाचन आयोग(जिसका निर्वाचन सम्पन्न कराने में सर्वोच्च स्थान है) में मास्टर ट्रेनर की भूमिका के रूप में प्रशिक्षण का कार्य हो.......ऐसी अनंत कार्य है.....जिनकी चर्चाएं अनंत है.......


एक ऐसे समाज सेवक,जो निर्विकार भाव से सदैव समर्पित होकर उसकी उन्नति हेतु प्रयत्नरत रहते है.......समाज के प्रति उनका समर्पण का अंदाजा बौद्धिक(शैक्षणिक),आर्थिक,शारीरिक एवं मानसिक रूप से संलिप्तता के दर्शन मात्र से लगाया जा सकता है..........सामाजिक दायर ऐसा कि, विश्व के सबसे बड़े संगठन के जिला स्तर पर छात्रों का प्रतिनिधित्व करते है.............


मेरे व्यक्तिगत जीवन मे....महाविद्यालय में प्रवेश के कुछ समय मे सम्पर्कित होने के पश्चात(ऐसे शिक्षक,जिनसे न चाहते हुए छात्र उनकी आभा से आकर्षित हो जाये,कुछ इसी प्रकार सर के संपर्क में आने के पश्चात) से लेकर सम्पूर्ण महाविद्यालयीन सफर में बिलासपुर जैसे अनजान जगहों पर एक जिम्मेदार पालक के दायित्व का निर्वहन करने के साथ,पितातुल्यता के भाव से प्रेरित एवं मार्गदर्शित कर जीवन पथ पर शास्वत रूप से कंटकाकीर्ण मार्गों के कांटो को अपने पुरुषार्थो से दूर करते हुए.........गतिमान होने हेतु प्रेरित करते है.......वो भी केवल मात्र एक निर्विकार एवं निस्वार्थ आकांक्षा,कि मेरे छात्र मानवीय जीवन के असीमित उचाईयो को(जो मानवीय कल्पनाओ में अस्तित्व रखता है)प्राप्त कर सके...........


ऐसे आदरणीय,सम्माननीय एवं पूज्यनीय गुरुवर,आचार्य श्री तरुणधर दीवान सर जी को उनके जन्मदिवस के इस शुभ एवं आंनदित अवसर पर हृदय की अन्तरतल से उद्वेलित भाव से अनंत,असीमित एवं अपर शुभकामनाये........💐🎂💐🎂



 ब्रम्हांड की समस्त ऊर्जाओं एवं शक्तियों से यही निवेदन की आप इसी प्रकार सफलता के असीम उचाईयो की प्राप्ति हेतु.....सदैव अग्रसर रहे एवं सफलता प्राप्त करते रहे......जिससे हमें गर्वित होने का अवसर प्राप्त होता रहे और हम भी आपके अनुगामी बन सके............आपके स्नेह एवं आशीर्वाद रूपी छाया हम पर सदैव आच्छादित हो..........इन्ही कामनाओ के साथ प्रणाम एवं सादर चरणस्पर्श सर.....🥰🥰❤️❤️


आपका अपना:- कृपेन्द्र तिवारी

" VIP दर्शन व्यवस्था "

मंदिर की परिकल्पना ऐसे स्थल के रूप में सर्वविदित है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति,जो उस पद्धति पर विश्वास रखता है, निर्बाध रूप से अपनी उपासना कर सक...