Tuesday, April 4, 2023
" VIP दर्शन व्यवस्था "
Sunday, January 8, 2023
शुभम मैम जन्मदिवस
Friday, December 9, 2022
आजादी की अमर कहानी
आजादी की अमर कहानी चलो सुनाऊ क्या है वो
बलिदानों की चिर कथाएं, सुनो बताऊं क्या है वो
सतत समर्पण करते आये, जन्मभूमि के मण्डन में
प्राण दिए न्यौछावर सबने,मातृभूमि के वंदन में
ललक जगी थी मातृभूमि,को आजादी दिलवानी है
वीर सपूत सब जाग उठे,माँ की सम्मान बचानी है
क्या कोड़े,क्या फाँसी,सब यत्नों को सहते जाना है
एकबिंदु मनोचित्तवृत्ति से,नौका को पार लगाना है
बलिदानों की कोटि कथाएँ,नही संभव गिन पाने में
देश के कुछ नेता ही जाने,बलिदानों के खजाने में
नमन करे बलिदानों को,आजादी है दिलवाए वो
नेता जी ने बल पर अपने,हिन्द-फौज को खड़ा किया
क्रांति की ज्वाला को उसने,पाल-पोष कर बड़ा किया
नेता जी के नेतृ गुणों ने,गोरो को लोहा मनवाया था
हिटलर जैसे तानाशाही से,नेता कहकर बुलवाया था
नरमपंथी के नरम नीति को,सिरे से अस्वीकार किया
आजादी के लक्ष्यों पर केवल,मातृभूमि से प्यार किया
तुम खून दियो आजादी दूंगा,नेता जी ने चिल्लाया था
दिल्ली चलो का नारा देकर,दिल्ली भी बुलवाया था
सतत प्रयत्नों के बूते पर,जय-हिंद बुलवाए है वो
तिलककाल में राष्ट्रवाद की, ज्वालायें प्रस्फुटित हुए
खुदीराम,चाकी,सावरकर,जैसे योद्धा अवतरित हुए
जन्मसिद्ध अधिकार मान,स्वराज्य भाव को बड़ा किया
होमरूल जैसे प्रकल्प को,तिलक-बिसेन्ट ने खड़ा किया
मराठा-केसरी के गुंजो से,सत्ता को भीतरघात किया
लाल-बाल की तिकड़ी से,खतरा गोरो ने भांप लिया
गणपति-उत्सव,शिवा-जयंती,प्रारम्भ जिसने करवाया था
जय शिवाजी,गणपति बप्पा,नारा जिसने लगवाया था
वीरप्रतापी तिलक महोदय,वंदे मातरम कहवाये वो
राजगुरु,सुखदेव,भगतसिंह,फंदों पर हँसते झूल गए
मातृभूमि की रक्षा खातिर,घर-परिवार को भूल गए
सहज उम्र,समकक्षी अपने,प्राण दिए बलिदानी वो
गोरी-नीति से खूब लड़े,पर हार न माने अभिमानी वो
आजाद गए आजाद हुए हम,कैसे भूलेंगे कहानी वो
समरांगण पर सदैव स्वतंत्र,स्वतंत्र गए अभिमानी वो
मूँछे ताने गुर्राते,हम शेर भवानी के है वो
Friday, November 25, 2022
Wednesday, November 9, 2022
"कार्यक्षेत्र में प्रथम दिवस के लिए यात्रा और उसका अनुभव"
Tuesday, November 1, 2022
" छत्तीसगढ़िया,सबले बढ़िया "
Monday, October 31, 2022
"आरक्षण मामले का दंश झेल रहे छात्र "
Saturday, October 29, 2022
छठगीत गायन को लेकर आरु साहू का विरोध
प्रदेशवासियों के मध्य वर्तमान कालखण्ड में क्षेत्रीयता को लेकर एक विशेष वृत्ति,जिसे संज्ञात्मक रूप से "क्षेत्रवाद" कहा जाता है......यह प्रबलता से दृष्टिगोचर है.......
स्वयं की संस्कृति के प्रति गौरव एवं सम्मान की भावना निःसंदेह व्यक्ति की प्राथमिकता हो,इसमें कोई दो विचार नही है........लेकिन यह प्राथमिकता ही अंतिम(एको अहं द्वितीयो नास्ति) का पर्याय साबित हो,तो यह न तो उस संस्कृति और न ही उसके अनुयायी जनमानस के लिए हितकर साबित होगा......ऐसी संकीर्ण स्वभाव व्यक्ति की अस्वीकार्यता को इंगित करता है.......उनकी द्वयवृत्ति का परिचायक है.....
तात्कालिक परिप्रेक्ष्य में यह विचार इस कारण रखा जा है,कि छत्तीसगढ़ अंचल की सुप्रसिद्ध लोकगायिका सुश्री आरु साहू जी के द्वारा भारतभूमि के महापर्व के रूप में लब्धप्रतिष्ठ "छठपर्व" से संबंधित गीत का गायन किया गया........निश्चित ही हम सब प्रदेशवासियों के लिए गर्व का विषय होना चाहिए,कि हमारे अंचल की लोकगायिका के कला का दायरा(सीमा) इतना विस्तृत हो गया,कि वह छत्तीसगढ़ी के अतिरिक्त अन्य राज्यो से संबंधित गीतों का गायन कर रही है.........
इसी मध्य(बीच) प्रदेश के कुछ संगठन एवं समाज द्वारा उनके विरुद्ध #bycott का ट्रेंड चलाया जाने लगा.......जो इस नवपल्लवीत,समीपस्थ राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचो में स्थापित गायिका के लिए बाधा उत्पन्न कर रहे थे........
कला एक ऐसी विधा है,जिसमें धर्म,लिंग,वर्ण,भाषा,क्षेत्र की सीमा को आरोपित नही किया जा सकता है......और हमे उनके गायन को गर्व के विषय के रूप में आत्मसात करना चाहिए.......
यही पर हमारे दोगले मनोवृत्ति का पर्दाफ़ाश होता है,कि एक ओर हम ऋषि सुनक जी का ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद पर चुने जाने को लेकर प्रसन्न हो स्वयं को गर्वित भाव से पेश करने में किसी भी प्रकार का कसर नही छोड़ा है.......जो न तो पूर्णतः भारतीय है......न तो पूर्णतः भारतीय संस्कृति को आत्मसात किये हुए है.....अर्थात संबंद्धता नाममात्र का भी नही लेकिन उसको अपना बनाने की होड़ में हम सब इतने आगे........
वही दूसरी ओर सुश्री आरु साहू जी के द्वारा "छठगीत" गायन का विरोध मन मे अनेक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है.........कि क्या फिर
1.क्षेत्रवाद इतना ही श्रेष्ठ है.....?
2.अन्य परम्पराओ का सम्मान स्वीकार्य नही.....?
ऐसी वृत्ति हमारी असहिष्णुता का परिचायक है......जिसका त्याग अत्यंत आवश्यक है.......हम तो ऐसी संस्कृति के वाहक हैं, जो "वसुधैव कुटुम्बकम" आदर्शो को शिरोधार्य कर जीवनयापन करता है........हमे सभी संस्कृति के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए.......हमे ऐसे संकीर्ण भाव के दमन हेतु भरसक प्रयास और जागरूकता की आवश्यकता है........
इसी विचार के साथ आपका......😊
शानदार,ज़बरदस्त, जिंदाबाद.........सुश्री आरु साहू जी👍
Monday, October 24, 2022
" ज्ञान वाली दीपावली "
सनातन संस्कृति के औचित्यपुरक,गौरव और गरिमा के आधारस्तंभ प्रभु श्री राम जी के द्वारा अन्याय रूपी लंका,अधर्म और असुरता के पुर(गढ़) का दमन कर निज धाम आगमन के अवसर पर नगर/ग्रामवासियों द्वारा सम्पूर्ण क्षेत्र को तात्कालिक प्रकाशिक माध्यम(दीप) से अत्यंत हर्षोल्लास एवं प्रसन्न भाव से आलोकित कर दिया गया........
तब से(सतयुग) लेकर आज तक जनमानस के द्वारा प्रभु के आगमन के स्मृति स्वरूप दीप को अवली अर्थात कतार(पंक्ति) में प्रज्वलित किया जाता है.........इस प्रकार दीपावली का ये पावन पर्व........स्वयं में अनंत ज्ञान,संदेश,प्रेरणा एवं आदर्श को समाहित किये हुए भारत मे ही अपितु सम्पूर्ण वैश्विक पटल मनाई जाती है.......
लेकिन इस हर्षोल्लास और उत्सव के मध्य कुछ वर्गों की यह वृत्ति......जनमानस की भावना को आघात पहुचाती है.....जो है इस समयकाल में उत्सव संबंधी ज्ञान के प्रसारण की है.......
तत्समय में ही एक बड़े ब्रॉडकास्टिंग एजेंसी (xyz) के द्वारा दीपावली को स्मृति पर कुछ इस प्रकार लाया गया,कि महिलाओं का इस पर्व के आयोजन के साथ ही शोषण का क्रम चलते आया है.......
यह कोई एक दृष्टांत नही है,जिससे हमारी भावनाएँ आहत होती हो......इस क्रम में चली आ रही ज्ञान प्रदाय की वृत्ति में वर्तमान समायानुक्रम में कुछ अल्पता दृष्टिगत होती है,लेकिन वृत्ति तो व्याप्त है ही............जो प्रदूषण,अतिव्ययन आदि अनेक संदर्भो पर प्रदान की जाती रही है और जाती है......
उन सभी को इस तथ्य से अवगत कारण चाहूंगा,कि हममे बौद्धिक एवं तार्किक क्षमता इतनी तो विकसित है,कि हम अपने निर्णयन में सक्षम है.....उचित क्या और अनुचित क्या?........विश्वास की सीमा क्या होगी........??
यदि फटाखा फोड़ने(प्रदूषण सम्बन्धी) के लिए ज्ञान दीपावली सम्मत हो,तो निश्चित ही मैं फटाखा फोड़ने का पक्षधर रहूँगा........ इसका अर्थ यह नही हुआ,कि मैं स्वयं फटाखा प्रस्फुटित करता हूँ........हमारी दीपावली में तो हमारे द्वारा एक भी फटाखा प्रस्फुटित नही किया जाता है.........लेकिन संदर्भवश मुझे सीमा बदलनी पड़ेगी.......इसमें मैं किंचित(तनिक भर) संशय में नही हूँ
ज्ञान एक ऐसा धन है,जिसके प्राप्ति पर किसी भी प्रकार का संकोच व्यक्ति के हित के विपरीत है........जिसका प्राप्त होना ही वरदान है......वह भी स्वत: प्राप्त होना तो फिर ईश्वरीय कृपा है........आलोचनात्मक ज्ञान हितकारी भी होता है.......उसे भी सहर्ष स्वीकार किया जा सकता है......
लेकिन आलोचना एक विशेष प्रयोजन(समक्ष को नत भाव) से हो यह स्वीकार नही.......इस प्रयोजन पर चर्चा विस्तृत है.......जिसे हम आगे करेंगे.....
आज के लिए आप सभी को अंधकार रूपी अहंकार हो ज्ञान रूपी आलोक के माध्यम से विलोपित और समूल नाश करने का संदेश देने वाले पर्व दीपावली की अनंत एवं असीमित शुभकामनाएं......... आप सभी पर प्रभु श्री राम जी एवं माँ लक्ष्मी जी की आशीर्वाद आच्छादित हो/प्राप्त हो.......आपका जीवन आनंदमय हो ऐसी कामना है हमारी........
इन्ही विचारो के साथ आपका......😊
Thursday, October 6, 2022
माँ दुर्गा विसर्जन, पंडरिया
#माँ_दुर्गा_विसर्जन
पंडरिया नगर में दशहरा पश्चात गत वर्ष की भाँति माँ दुर्गा जी का विसर्जन होना था......लेकिन विसर्जन कार्यक्रम में हमारे ही जनमानस के द्वारा कुछ फूहड़ता,माँ की उपस्थिति को अपमानित करने वाली गीत-संगीत का चलाना........ जनमानस की आस्था को आहत करती थी।
इसी क्रम में नवरात्र पर्व प्रारम्भ होने के पूर्व नगर के गणमान्यजन विशेषत: व्यापारी संघ पंडरिया एवं पुलिस प्रशासन के साझा सहयोग एक नवाचारी पहल किया गया......यह पहल था,कि
1) माँ के विसर्जन को एक विशेष विषय पर आधारित थीम के अनुसार विसर्जन हेतु निकलना।
2) एक निश्चित समयांतराल में सभी की उपस्थिति।
3) समिति को प्रदाय झाँकी क्रमांक के अनुरूप अपनी झाँकी प्रस्तुत करते हुए आगे बढ़ना।
4)इस कार्यक्रम में किसी भी प्रकार की अश्लीलता,फूहड़ता को शामिल नही करना,जिससे जनभावना आहत होती हो।
यह नवाचार वर्तमान में अपनी प्रासंगिकता में लगभग पूर्णता को प्राप्त करने की ओर अग्रसर रहा.......इससे आने वाले समय मे नगर को सांस्कृतिक रूप से अनेक लाभ होंगे....
1) समितियों में सकारात्मक प्रतिस्पर्धा विकसित होंगी।
2) इससे नगर के समिति एवं मंडल में रचनात्मकता का विकास होगा।
3) जाने अनजाने होने वाले माता के अपमान पर अंकुश लगेगा।
4) आने वाले वर्षों में पंडरिया नगर का नाम ख्यातिलब्ध होगा....साथ ही ऐसे प्रदर्शनों से समीपस्थ ग्रामीण बन्धुओ,माता-बहनों के द्वारा झाँकी दर्शन हेतु आगमन होगा।
जो निश्चित ही पंडरिया में पूर्व के राजकालीन परिदृश्य में दशहरा में जो परिवेश रहता था,उसे पुनः प्राप्त करने में सहायक होगा.....और एक उत्कृष्ट परमपरा विकसित होंगी........
ऐसी सोच के साथ आपका.......😊❤️🙏
Monday, October 3, 2022
नवरात्र आयोजन:- गरबा
सनातन धर्म बह्यन्तर कारको से अधिक अभ्यंतर कारको से विकृतता की ओर अग्रसर है..........
"गरबा" के नाम पर जो आयोजन किये जा रहे है,उसमे मुख्य विषय अर्थात केंद्रबिंदु,दैवीय आराधना का होने के अतिरिक्त(बजाय).....सारे वो साधन उपलब्ध है,जो मनोरंजन एवं अन्य मानवीय स्वार्थिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु आवश्यक है। इस तारतम्य में अनेक मंडल एवम समिति माता की आराधना एवं भक्ति जैसे तथाकथित पोस्टर छपवा कर ऐसे सेलेब्रिटी(नायिका) को मुख्य आथित्य अथवा नृत्य/गायन प्रदर्शन हेतु आमंत्रित करते है........जिन्हें माता से दूर दूर तक कोई सरोकार नही और वह मनमाने ढंग से नृत्य/गायन,जो लोगो के बीच एक मनोरंजन(@$#%) माहौल पैदा कर दे,प्रस्तुत करती है। इस पूरे क्रम उनका कोई दोष नही,क्योकि वो तो अपने कार्यक्षेत्र के अनुरूप कार्य कर रहे है। उनका तो कार्य ही है,रंगमंच पर ऐसे रस से युक्त कार्यक्रम की प्रस्तुति करना,जिस हेतु वह लब्धप्रतिष्ठ है।
इसमें मुख्य रूप जवाबदेह तो हम और हमारा ये समाज है,जो अपने ही आराध्य(माँ दुर्गा) को आधार मानते हुए कुछ तुच्छ रसास्वादन हेतु ऐसे कार्यक्रम आयोजित कर रहे है अथवा उसमे शामिल हो रहे है।
गरबा जैसे सांस्कृतिक नृत्य के आत्मीकरण,स्वीकार्यता एवं प्रसार का किंचित भी विरोध नही.......अपितु उनके मूलभूत तत्व(उद्देश्य/आराधना) को अल्पीकृत करना स्वीकार नही..........
और यदि जनमानस के क्षेत्रीय गर्व की भावना को केंद्रित करते हुए बात कही जाए तो हमे प्राथमिकता "सुवा नृत्य","जसगीत" एवं "कर्मा नृत्य" को देना चाहिए,जिससे हममे स्वयं की क्षेत्रीय संस्कृति के प्रति गर्व का भाव जागृत होगा...........और संस्कृति संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य भी पूर्ण होंगे.........
और यह स्थिति फिर वर्तमान में कही जा रही तथाकथित गर्वयुक्त ध्येयवाक्य "छत्तीसगढ़िया,सबले बढ़िया" को प्रासंगिकता के पैमाने पर अस्तित्वमय करेंगी और जो अपनी यथार्थता को प्राप्त करेगी.......🤔🤔🤔
Sunday, October 2, 2022
साक्षात्कार:-29 सितम्बर,2022
Wednesday, September 14, 2022
कार्यालयीन प्रशिक्षण अनुभव
विषय:-कार्यालय,क्षेत्रीय उपसंचालक,छत्तीसगढ़ राज्य संपरीक्षा,दुर्ग की ओर से विभाग एवं कार्यालय के क्रियाकलाप संबंधी जानकारी हेतु दिनांक 07/09/22 से 09/09/22 तक त्रिदिवसीय प्रशिक्षण सत्र पर प्रतिविचार बाबत।
•प्रथम दिवस:-दिनाँक 07/09/22 को ज्येष्ठ संपरिक्षक मैम श्रीमती सरला साहू एवं सुश्री मिथिलेश्वरी शर्मा जी के द्वारा प्रातः 11 बजे से छत्तीसगढ़ राज्य संपरीक्षा प्रक्रिया एवं स्थानीय निकाय के संबंध में प्राथमिक परिचय दिया गया। जिससे हमें अपने कार्यालय के द्वारा किये जा रहे अंकेक्षण कार्य हेतु निकाय संबंधी जानकारी प्राप्त हुए। सबसे महत्वपूर्ण यह रहा,कि हमे हमारे विभाग का पूर्व नाम "स्थानीय निधि संपरीक्षा" का नामनुरूप जानकारी एवं वर्तमान नाम रखने संबंधी प्रासंगिकता समझ मे आयी।
द्वितीय सत्र श्रीमती गुपेश्वरी मैडम जी का रहा,यह सत्र मेरे लिए अति महत्वपूर्ण रहा,क्योकि इस कार्यालय संबंधी वास्तविकता एवं यथार्थ से परिचय मैंम से प्रात्यक्षिकता के फलस्वरूप ही प्राप्त हुआ। जिस तारतम्य में अंकेक्षित निकाय में किये अंकेक्षण कार्य के फलस्वरूप हमारे द्वारा अपनायी जाने वाली प्रतिवेदन की प्रक्रिया को बड़े ही सहज एवं सरल भाषा शैली में व्यक्तिगत अनुभव के माध्यम से समझाया गया। प्रतिवेदनों का निकाय से संचालनालय तक पहुचने की स्तरबद्ध जानकारी उल्लेखनीय रही। तथा प्रतिवेदनों का विधान सभा पटल मे रखने की प्रक्रिया समझाकर एवं वार्षिक प्रतिवेदन को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया गया।
•द्वितीय दिवस:-दिनाँक 08/09/22 का प्रथम सत्र श्रीमती अरुणा पवार जी तथा एवं श्री दीनबंधु चतुर्वेदी सर का रहा,लेकिन किसी कारणवश श्री चतुर्वेदी सर की अनुपस्थिति में उस सत्र का संचालन श्री होमन कुमार ठाकुर सर के द्वारा किया गया,जिसमें "ऑडिट ऑनलाइन" विषय पर कंप्यूटर के माध्यम से प्रत्यक्ष प्रशिक्षण दिया गया,विषय का नया स्वरूप एवं तकनीक आधरित होने के कारण उक्त विषय पूर्णरूपेण समझ नही आया लेकिन विषय के प्रति समझ पैदा हुई।
आगे अरुणा मैम के द्वारा संपरीक्षा अधिनियम,1973 का वाचन करते हुए,उसके सैद्धान्तिक स्वरूप से अवगत कराया गया।
द्वितीय सत्र श्री अतुल कुमार अग्रवाल एवं श्रीमती रामेश्वरी मैम के द्वारा लिया गया। अग्रवाल सर का द्विदिशीय वार्तालाप एवं प्रश्नोत्तर शैली,विषय के समझ हेतु मन को सहज ही आकर्षित करता है और साथ ही रामेश्वरी मैम का समझाने के प्रति उत्सुखता।
श्री अग्रवाल सर के द्वारा हमारे अब तक के कार्यालयीन समझ का आंकलन कर गबन,अंकेक्षण शुल्क एवं मासिक माहिती की जानकारियां प्रदान किया गया।जिसमें रामेश्वरी मैम के द्वारा भी निकायों के उक्त विषय संबंधी परिचय कराया गया।
•तृतीय दिवस:-दिनाँक 09/09/22 को श्री दिनेश कुमार सर के द्वारा बजट,स्थापना,वेतन निर्धारण एवं अधिभार संबंधी समस्त जानकारी सह अधिनियम प्रदान किया गया। श्री सर जी का प्रशिक्षण सत्र के साथ उनकी उपस्थिति इस कार्यालय में एक अभिभावक की भूमिका को पूरा करता है। सर के द्वारा प्रदत्त वेतन निर्धारण एवं अवकाश संबंधी जानकारी अत्यधिक आकर्षित करने वाला था।
Sunday, October 17, 2021
"75 दिनों का विश्वप्रसिद्ध दशहरा"
Thursday, May 27, 2021
ब्राह्मणजनों का दायित्व
Friday, January 8, 2021
अमेरिकी संसद में हिंसा
लोकतंत्र के सही मायने,ये हमको क्यो बतलाते तुम।।
स्वयं के संसद में देखो,कि कैसे हिंसा प्रस्फुटित हुए।
स्वार्थसत्ता के भावों से,जनमत से क्यो तुम रुष्ट हुए।।
देशवासियो के निर्णय और जनमत का सम्मान करो।
सहर्ष गर्व के भावों से तुम सत्तापद से विश्राम करो।।
:-कृपेन्द्र तिवारी......
Thursday, December 31, 2020
नववर्ष,2021 पर विचार
Saturday, December 19, 2020
संगठित होना है जरूरी.....
संगठित_होना_है_जरूरी
भारतीय इतिहास संघर्षो का इतिहास है।इसमे अनेक आक्रमणकारी प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक आये,उनके द्वारा स्थानीय शासन से परस्पर विस्तारवादी नीतिओ को लेकर संघर्ष होते रहे.......लेकिन इतिहास के अध्ययन का उद्देश्य ही होता है,कि पूर्व में दोहराई गई गलतियो का पुनःआचरण न हो....
भारतीय इतिहास में इस संघर्ष और गुलामी के पीछे के कारण को हम तर्कसंगत दृष्टिकोण से देखे तो स्पष्टीकृत होता है,कि हममे चिरकाल से लेकर अधुनातन काल तक संगठन,परस्पर सहयोग और समन्वय की भावना का अभाव रहा है। यही कारण रहा कि हमारा भारत देश एक केंद्रीकृत राष्ट्र के रूप में पूर्व से छवि बनाने में असफल रहा है....केवल अपवाद जैसे चंद्रगुप्त मौर्य जैसे शासको के शासनकाल को छोड़कर......
महत्वपूर्ण कारणों का अध्ययन करे तो दृष्टिगत होता है,कि हमारी स्वार्थिक भावना तथा साम्राज्यवादी नीतियां ऐसी रही है,कि जो हमारे लिए ही घातक सिद्ध होती रही.....ऐसी विचारधारा कि "आक्रमणकारी शत्रु राज्य पर आक्रमण कर रहा है तो मुझे क्या मतलब" ऐसे भाव ही हमारे गुलाम होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण है.......जो हमारे पूर्वजो के संकीर्ण मानसिकता का उपज है..........
हमे "unity is strength" अर्थात एकता में ही शक्ति है के मूलभूत भाव को आत्मसात करना चाहिए.....और आज के परिदृश्य में यही हमारी एकता का भाव,आक्रमणकारी बाबर के सेनापति "मीर बाकी" के द्वारा 1528 में तोड़े गए मंदिर के पश्चात किये गए मस्जिद निर्माण के क्रूरतम कदम का निवारण आज कर रही है......इसका मुख्य कारण है हिन्दू पक्ष का जागृत होना.....एकमय होना.......सुसंगठित होना.......
इस जागरण और एकमय भावना को प्रसारित करने के संघर्ष में लाखों हिन्दू बंधु-बांधव और हमारे पूर्वजो ने अपने प्राणों की आहुतियां दी है......इसी जागरण और एकता के सूत्र में पिरोने का संकल्प ले "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" की नींव रखी गई......जो सार्थक और प्रभावी रूप से लोगो के अंतर्मन में राष्ट्रप्रेम,धर्मप्रेम एवं समर्पण,ऐसा कि सर्वस्व न्यौछावर कर दे........ऐसे भाव को भारतीय जनमानस में संचार कर उनके हृदय में अन्तरग्रहीत कराये.....
इसका प्रतिफल हमारे समक्ष है,कि वो एतिहासिक क्षण के हम साक्षी बन रहे है,जिनके लिए लाखों बलिदान हुए......."श्री रामचंद्र जी के मंदिर" का निर्माण अपने चरम पर है........
यह मंदिर केवल मात्र मंदिर नही है,बल्कि यह वह राष्ट्रमन्दिर है,जो हमे याद दिलाता रहेगा कि ये हमारी एकता का प्रतिफल है और सदैव भविष्य में इस भावना को जागृत करने हेतु प्रेरित करता रहेगा...........
तो लेख के लेखन का सार स्पष्ट है,कि हम यदि संगठित है......तो भारतवर्ष को विश्वगुरु बनने से कोई नही रोक सकता........
आपका:-कृपेन्द्र तिवारी
Thursday, December 17, 2020
गुरु घासीदास जयंती
#गुरु_घासीदास_जयंती
भारतीय समाज अनेकानेक वर्षो से फलीभूत रहा है...लेकिन समयचक्र में परिवर्तन के साथ समाज मे कुछ निम्न मानसिकताओं, अंधत्व,भेदभाव,समरसता का अभाव ने स्थान ले लिया...निश्चित ही ये विभिन्न कारक प्रगतिशील समाज के लिए घातक है.......इस हेतु समय-समय पर धार्मिक सुधार आंदोलन हुए....जिसमे 13-14 शताब्दी के मध्य भक्ति आंदोलन चरम पर था...ये धार्मिक आंदोलन धार्मिक जागरूकता फैलाने तथा धर्म के प्रति लोगो का ध्यान आकृष्ट करने का कारण बना...लेकिन इस समयकाल में भी कुछ संतो के द्वारा अपने रचनाओं में तात्कालिक समाज की कुरीतियो और उनकी जड़तारूपी दशा को इंगित कर उस पर कुठाराघात करने का भरसक प्रयास किया गया...जिसमे प्रमुख रूप से संत कबीर दास,तुलसीदास,नानक,दादूदयाल इत्यादि थे...जो सामाजिक सुधार के क्षेत्र में विशेष ध्यान एवं योगदान दिए.....
भारतीय समाज मे हुए अनेक आक्रमण,आतताइयों तथा कुछ प्रबुद्ध वर्ग(जो मात्र जाति से उच्च हो के साथ-साथ प्रत्येक वर्ग,जो सम्पन्न हो) के द्वारा हमारे समाज का शोषण तथा सामाजिक तानेबाने को ध्वस्त करने का प्रयास किया गया जो इस हेतु पूर्णरूपेण जिम्मेदार है......सामाजिक क्रांति के इसी कड़ी में सन 1756 में छत्तीसगढ़ की पावन धरा में गिरौदपुरी(बलौदाबाजार) नामक स्थान में एक सामाजिक संत "गुरु घासीदास" जी का प्रादुर्भाव हुआ...
जिन्होंने भारतीय समाज मे व्यापित विकृतियो,जिसमे भेदभाव का स्थान चरम पर था,के उन्मूलन हेतु अविस्मरणीय योगदान दिए...बचपन से वैराग्य वृत्ति के धनी घासीदास जी ने सन 1820 में सतनाम पंथ की स्थापना की...जिसके अनुयायी "सतनामी" अर्थात "सत्य के नाम पर चलने वाला" कहलाये...
इन्होंने अपने मत में मूर्तिपूजा,समाज मे व्याप्त पशुबलि,हिंसा जैसे मान्यताओ को सिरे से नकार कर उनका विरोध किया...तथा अपने पंथ के अंतर्गत निम्नांकित 7 उपदेशो के माध्यम से सामाजिक क्रांति लाने का प्रयास किये...
1.मादक पदार्थ से परहेज
2.मांस भक्षण का परित्याग
3.सामाजिक समरसता के भाव का अंतर्ग्रहण
4.मूर्तिपूजा का विरोध
5.गयो से हल के माध्यम से जोताई बंद
6.दोपहर में हल चलाना बंद
7.सत्पुरुष सतनाम की निराकार उपासना.......आदि
आज इस पावन दिवस पर घासीदास जी के द्वारा दिये उपर्युक्त उपदेशो को हम जनमानस अपने जीवन मे किस स्तर पर अंतर्ग्रहित किये है...इस हेतु हमें मंथन करने की आवश्यकता है...जो गुरु घासीदास जी की जयंती को मनाने के लिए उचित कारण होगा,कि उनके उपदेश को आत्मसात कर सत्य के मार्ग पर चले और आज के समाज मे जागरूकता फैला सके...यही उनके जयंती पर हमारी सच्ची एवं निष्पक्ष भावार्पण होगी...
क्योकि आज समाज केआ भ्रष्टाचार,चोरी,झूठ के बुनियाद पे टिके होने से निवारण का उपाय मात्र...उनके उपदेशो का ससम्मान आचरण करना है.......यही प्रति हमारी सच्ची कृतज्ञता होगी ❤️❤️❤️💐💐💐🙏🙏🙏
#आपका:-कृपेन्द्र तिवारी
Tuesday, October 13, 2020
जन्मदिवस शुभकामनाये..... दीवान सर.....
" VIP दर्शन व्यवस्था "
मंदिर की परिकल्पना ऐसे स्थल के रूप में सर्वविदित है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति,जो उस पद्धति पर विश्वास रखता है, निर्बाध रूप से अपनी उपासना कर सक...
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क्रिकेट के मक्का लार्ड्स के मैदान में हो रहे,क्रिकेट विश्वकप मैच २०१९ के फाइनल मैच को देखकर शायद ही कोई ऐसा बंदा रहा हो...
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लगभग दो वर्ष के कोरोना महामारी के दौर में सरकारी नियोजन(नौकरी) में हुए स्थगन के पश्चात "भर्ती प्रक्रिया" ने दम भरना प्रारम्भ ही कि...
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आज के दिवस का प्रारम्भ प्रातः काल मे 4:30 में हुआ। ये रहा अपने निज निवास पंडरिया से अपने कार्यक्षेत्र में गमन करने के लिए तैयारी का क्रम। कड़...